रसिया-माधुरी · पद 18
वारी-वारी छवि, मोर-मुकुट-वारी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vārī-vārī chhavi, mora-mukuṭa-vārī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1वारी-वारी छवि, मोर-मुकुट-वारी।
2चितवनि अति मतवारी प्यारी, पुनि घुँघरारी लट कारी।
3मृदु-मुसकान प्रान-जीवन-धन, पुनि कुंडल हलकनि न्यारी।
4फहर-फहर फहरान पीत-पट, पुनि कौस्तुभ-मणि माला री।
5ललित-त्रिभंगी गति अड़बंगी, पुनि मुरली-धुनि अति प्यारी।
6पुनि “कृपालु” सुनि रति-रस-बतियन, त्रिभुवन कौन न बलिहारी॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! तुम्हारी मोर-मुकुट वाली छवि पर मैं अपना सर्वस्व न्यौछावर करता हूँ। तुम्हारी मतवाली आँखों को प्यार भरी चितवन अत्यन्त प्यारी है, फिर काली, घुँघराली अलकावलि का तो कहना ही क्या है? मेरी प्राणों की प्राण! तुम्हारी मंद मुस्कान अनिर्वचनीय है, फिर नीले गालों पर कुंडल का झूमना और भी विलक्षण है। पीताम्बर की फहरान बरबस विभोर करती है, फिर कौस्तुभ मणिमाला की छवि तो देखते ही बनती है। ग्रीवा, कटि एवं चरणों की मनोहर मुरनि तथा अनोखी मतवाली चाल देखते ही बनती है। फिर मुरली ने तो रोम-रोम में दिव्य प्रेमरस भर दिया है। 'कृपालु' कहते हैं कि सबसे सरस तो वह है जब श्यामसुन्दर अन्तरंग रतिरस की बातें करते हैं, उन्हें सुनकर विश्व में कौन बलिहार न जावेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 910