# वारी-वारी छवि, मोर-मुकुट-वारी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0983-M20-K018
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: रसिया-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 18
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 462–462

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>वारी-वारी छवि, मोर-मुकुट-वारी।  
<a id="line-2"></a>चितवनि अति मतवारी प्यारी, पुनि घुँघरारी लट कारी।  
<a id="line-3"></a>मृदु-मुसकान प्रान-जीवन-धन, पुनि कुंडल हलकनि न्यारी।  
<a id="line-4"></a>फहर-फहर फहरान पीत-पट, पुनि कौस्तुभ-मणि माला री।  
<a id="line-5"></a>ललित-त्रिभंगी गति अड़बंगी, पुनि मुरली-धुनि अति प्यारी।  
<a id="line-6"></a>पुनि “कृपालु” सुनि रति-रस-बतियन, त्रिभुवन कौन न बलिहारी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुम्हारी मोर-मुकुट वाली छवि पर मैं अपना सर्वस्व न्यौछावर करता हूँ। तुम्हारी मतवाली आँखों को प्यार भरी चितवन अत्यन्त प्यारी है, फिर काली, घुँघराली अलकावलि का तो कहना ही क्या है? मेरी प्राणों की प्राण! तुम्हारी मंद मुस्कान अनिर्वचनीय है, फिर नीले गालों पर कुंडल का झूमना और भी विलक्षण है। पीताम्बर की फहरान बरबस विभोर करती है, फिर कौस्तुभ मणिमाला की छवि तो देखते ही बनती है। ग्रीवा, कटि एवं चरणों की मनोहर मुरनि तथा अनोखी मतवाली चाल देखते ही बनती है। फिर मुरली ने तो रोम-रोम में दिव्य प्रेमरस भर दिया है। 'कृपालु' कहते हैं कि सबसे सरस तो वह है जब श्यामसुन्दर अन्तरंग रतिरस की बातें करते हैं, उन्हें सुनकर विश्व में कौन बलिहार न जावेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 910

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
