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RADHEY RADHEY

रसिया-माधुरी · पद 17

वारी-वारी छवि छैल-बिहारी की।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vārī-vārī chhavi, chhaila-bihārī kī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1वारी-वारी छवि छैल-बिहारी की।

2कहा कहूँ सखि! अहा शीश पर, मुकुट-लटक छबि प्यारी की।

3उपमा कौन मौन नहिं लखि सखि! लट-लटकनि अनियारी की।

4लखतहिं बनत नील-गालन पर, कुंडल-छवि छविधारी की।

5भनत बनै न नैन चितवति छवि, मारि जियावन-हारी की।

6मुरि-मुरि मधुर-मधुर मुसकनि छवि, का कहिये बनवारी की।

7उर पट-पीत हार गर गुंजन, काछनि-छवि छवि न्यारी की।

8धनि कंकन किंकिनि नूपुर छवि, धनि-धनि धुनि झनकारी की।

9नारी कौन न वारी लखि सखि! लटपट चाल अनारी की।

10कह “कृपालु” पुनि बिनुहिं कहे भल, छवि मुरलिहिं मनहारी की॥

हिन्दी भावार्थ

मैं श्यामसुन्दर की उस छवि पर बलिहार जाती हूँ। अरी सखि! क्या कहुँ सिर पर मुकुट की लटक की प्यारी छवि कितनी प्यारी है! श्यामसुन्दर की घुँधराली लटों की लटकन को देखकर कौन-सी उपमा चुप नहीं हो जाती? उनके नीले गालों पर हिलते हुए कुंडल की मनोहर छवि देखते ही बनती है। उनकी आँखों की चितवनि का वर्णन कौन करे जो बार बार मार कर जीवित करती है। घूम-घूम कर मंद-मंद मुस्कराने की झाँकी का क्या कहना है! वक्षःस्थल पर पीताम्बर एवं गुंजमाल तथा कमर में काछनी की निराली ही छवि है। उनके कंगन, किंकिनी और नूपुर की छवि तथा उनकी मधुर झनकार बरबस मनोहारिणी है। विश्व में ऐसी कौन सी नारी है जो उनकी मतवाली चाल को देखकर विभोर न हो जाये। 'कृपालु' कहते हैं-मुरली की सुरीली तान के विषय में कुछ कहना ही व्यर्थ है, उसकी मधुरता तो शिव, सनकादिक, परमहँस भी कुछ-कुछ ही जानते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 909