# वारी-वारी छवि छैल-बिहारी की।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0982-M20-K017
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: रसिया-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 17
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 461–462

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>वारी-वारी छवि छैल-बिहारी की।  
<a id="line-2"></a>कहा कहूँ सखि! अहा शीश पर, मुकुट-लटक छबि प्यारी की।  
<a id="line-3"></a>उपमा कौन मौन नहिं लखि सखि! लट-लटकनि अनियारी की।  
<a id="line-4"></a>लखतहिं बनत नील-गालन पर, कुंडल-छवि छविधारी की।  
<a id="line-5"></a>भनत बनै न नैन चितवति छवि, मारि जियावन-हारी की।  
<a id="line-6"></a>मुरि-मुरि मधुर-मधुर मुसकनि छवि, का कहिये बनवारी की।  
<a id="line-7"></a>उर पट-पीत हार गर गुंजन, काछनि-छवि छवि न्यारी की।  
<a id="line-8"></a>धनि कंकन किंकिनि नूपुर छवि, धनि-धनि धुनि झनकारी की।  
<a id="line-9"></a>नारी कौन न वारी लखि सखि! लटपट चाल अनारी की।  
<a id="line-10"></a>कह “कृपालु” पुनि बिनुहिं कहे भल, छवि मुरलिहिं मनहारी की॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मैं श्यामसुन्दर की उस छवि पर बलिहार जाती हूँ। अरी सखि! क्या कहुँ सिर पर मुकुट की लटक की प्यारी छवि कितनी प्यारी है! श्यामसुन्दर की घुँधराली लटों की लटकन को देखकर कौन-सी उपमा चुप नहीं हो जाती? उनके नीले गालों पर हिलते हुए कुंडल की मनोहर छवि देखते ही बनती है। उनकी आँखों की चितवनि का वर्णन कौन करे जो बार बार मार कर जीवित करती है। घूम-घूम कर मंद-मंद मुस्कराने की झाँकी का क्या कहना है! वक्षःस्थल पर पीताम्बर एवं गुंजमाल तथा कमर में काछनी की निराली ही छवि है। उनके कंगन, किंकिनी और नूपुर की छवि तथा उनकी मधुर झनकार बरबस मनोहारिणी है। विश्व में ऐसी कौन सी नारी है जो उनकी मतवाली चाल को देखकर विभोर न हो जाये। 'कृपालु' कहते हैं-मुरली की सुरीली तान के विषय में कुछ कहना ही व्यर्थ है, उसकी मधुरता तो शिव, सनकादिक, परमहँस भी कुछ-कुछ ही जानते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 909

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
