रसिया-माधुरी · पद 21
वृन्दावन, रसिकन रजधानी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vṛindāvana, rasikana rajadhānī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1वृन्दावन, रसिकन रजधानी।
2जा रजधानी की ठकुरानी, महरानी राधा-रानी।
3जा रजधानी पनिहारिनि बनि, चारिहुँ मुक्ति भरति पानी।
4जा रजधानी रज अज याचत, प्रान-सजीवनि सम जानी।
5जा रजधानी बिच नहिं पावत, टुक प्रवेश कमला वानी।
6कह “कृपालु” जेहि महिमा कछु-कछु, लालिहिं कृपा लाल जानी॥
हिन्दी भावार्थ
एक रसिक कहता है कि-श्रीवृन्दावन-धाम रसिकों की राजधानी है। जिस राजधानी में वृषभानुनन्दिनी स्वामिनी रूप से सुशोभित हैं। जिस राजधानी में चारों मुक्तियाँ पनिहारिन बन कर पानी भरती हैं। जिस राजधानी की धूलि को प्राणाधिक प्रिय जानकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भिक्षुक बनकर भिक्षा-याचना करता है। जिस राजधानी में महालक्ष्मी तथा सरस्वती को प्रवेश का अधिकार प्राप्त नहीं है। 'कृपालु' कहते हैं कि इतना ही कहना पर्याप्त है कि वृन्दावन की महिमा किशोरी जी के कृपा-कटाक्ष से श्यामसुन्दर भी कुछ-कुछ ही जानते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 913