# वृन्दावन, रसिकन रजधानी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0986-M20-K021
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: रसिया-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 21
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 464–464

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>वृन्दावन, रसिकन रजधानी।  
<a id="line-2"></a>जा रजधानी की ठकुरानी, महरानी राधा-रानी।  
<a id="line-3"></a>जा रजधानी पनिहारिनि बनि, चारिहुँ मुक्ति भरति पानी।  
<a id="line-4"></a>जा रजधानी रज अज याचत, प्रान-सजीवनि सम जानी।  
<a id="line-5"></a>जा रजधानी बिच नहिं पावत, टुक प्रवेश कमला वानी।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” जेहि महिमा कछु-कछु, लालिहिं कृपा लाल जानी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक रसिक कहता है कि-श्रीवृन्दावन-धाम रसिकों की राजधानी है। जिस राजधानी में वृषभानुनन्दिनी स्वामिनी रूप से सुशोभित हैं। जिस राजधानी में चारों मुक्तियाँ पनिहारिन बन कर पानी भरती हैं। जिस राजधानी की धूलि को प्राणाधिक प्रिय जानकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भिक्षुक बनकर भिक्षा-याचना करता है। जिस राजधानी में महालक्ष्मी तथा सरस्वती को प्रवेश का अधिकार प्राप्त नहीं है। 'कृपालु' कहते हैं कि इतना ही कहना पर्याप्त है कि वृन्दावन की महिमा किशोरी जी के कृपा-कटाक्ष से श्यामसुन्दर भी कुछ-कुछ ही जानते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 913

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
