रसिया-माधुरी · पद 8
धनि-धनि तिन ब्रज-गोप-वधूटिन,
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dhani-dhani tina braja-gopa-badhūṭina, jinako chākara brahma sadāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1धनि-धनि तिन ब्रज-गोप-वधूटिन,
2जिनको चाकर ब्रह्म सदाय।
3कोऊ मिस उरहन घर आवे।
4कोऊ मग महँ दरसन पावे।
5काउहिं जानि जानि तड़पावे।
6सुनि वाकी गारी"दारी के", पुनि-पुनि बलि-बलि जाय।
7नित पनघट पै जात कन्हाई।
8सबै सखिन घट देत उठाई।
9जो कोउ सखि इकली ही आई।
10वा नागरि गागरि उठाय पुनि, नागर घर पहुँचाय।
11कोउ माखन निज हाथ खवावे।
12कोउ लजाय तब हाथन खावे
13कोउ बरजै पै मन-मन भावे।
14वा माखन उर-अन्तर्यामी, लूटि-लूटि के खाय।
15कोउ हँसि-हँसि आपुहिं बतरावे।
16कोउ लजाय तेहि आपु बुलावे।
17कोउ घर ते नहिं निकरन पावे।
18वा घर जाय “कृपालु” छेड़ि तेहि, चौर जार पद पाय॥
हिन्दी भावार्थ
उन ब्रजांगनाओं को धन्य है जिनकी ब्रह्म श्यामसुन्दर दासता करता है। कुछ गोपियाँ उलाहना देने के बहाने श्यामसुन्दर के घर आती हैं। कुछ को मार्ग में ही दर्शन मिल जाता है। गोपियों को श्यामसुन्दर जान-जान कर तड़पाते हैं और फिर उनकी 'दारी के 'इस गाली को सुन-सुनकर बलिहार जाते हैं। श्यामसुन्दर उनकी सेवा के हेतु नित्य पनघट पर जाते हैं एवं र सखियों का घड़ा उठवा देते हैं। ही आयी होती है उसके घड़े को उठाकर पुनः उसे घर तक हुँचा आते हैं। कोई सखी श्यामसुन्दर को मक्खन अपने हाथ व खिलाती है, कोई लजाती है तो अपने हाथ से खा लेते हैं निई मुँह से रोकती है पर मन से चाहती है उस गोपी के क्खन को अन्तर्यामी श्यामसुन्दर लूट-लूट कर खाते हैं। खी हँस-हँस कर श्यामसुन्दर से अपने आप बातें करती है। नई लजाती है तो उससे श्यामसुन्दर स्वयं बातें करते हैं। रुजनों के शासन के कारण घर से नहीं निकलने पाती। कृपालु' कहते हैं कि उस गोपी के घर जाकर तथा उसे छेड़ नर "चोर''जार'की उपाधि ग्रहण करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 893-894