# धनि-धनि तिन ब्रज-गोप-वधूटिन,

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0973-M20-K008
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: रसिया-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 8
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 453–453

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>धनि-धनि तिन ब्रज-गोप-वधूटिन,  
<a id="line-2"></a>जिनको चाकर ब्रह्म सदाय।  
<a id="line-3"></a>कोऊ मिस उरहन घर आवे।  
<a id="line-4"></a>कोऊ मग महँ दरसन पावे।  
<a id="line-5"></a>काउहिं जानि जानि तड़पावे।  
<a id="line-6"></a>सुनि वाकी गारी"दारी के", पुनि-पुनि बलि-बलि जाय।  
<a id="line-7"></a>नित पनघट पै जात कन्हाई।  
<a id="line-8"></a>सबै सखिन घट देत उठाई।  
<a id="line-9"></a>जो कोउ सखि इकली ही आई।  
<a id="line-10"></a>वा नागरि गागरि उठाय पुनि, नागर घर पहुँचाय।  
<a id="line-11"></a>कोउ माखन निज हाथ खवावे।  
<a id="line-12"></a>कोउ लजाय तब हाथन खावे  
<a id="line-13"></a>कोउ बरजै पै मन-मन भावे।  
<a id="line-14"></a>वा माखन उर-अन्तर्यामी, लूटि-लूटि के खाय।  
<a id="line-15"></a>कोउ हँसि-हँसि आपुहिं बतरावे।  
<a id="line-16"></a>कोउ लजाय तेहि आपु बुलावे।  
<a id="line-17"></a>कोउ घर ते नहिं निकरन पावे।  
<a id="line-18"></a>वा घर जाय “कृपालु” छेड़ि तेहि, चौर जार पद पाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

उन ब्रजांगनाओं को धन्य है जिनकी ब्रह्म श्यामसुन्दर दासता करता है। कुछ गोपियाँ उलाहना देने के बहाने श्यामसुन्दर के घर आती हैं। कुछ को मार्ग में ही दर्शन मिल जाता है। गोपियों को श्यामसुन्दर जान-जान कर तड़पाते हैं और फिर उनकी 'दारी के 'इस गाली को सुन-सुनकर बलिहार जाते हैं। श्यामसुन्दर उनकी सेवा के हेतु नित्य पनघट पर जाते हैं एवं र सखियों का घड़ा उठवा देते हैं। ही आयी होती है उसके घड़े को उठाकर पुनः उसे घर तक हुँचा आते हैं। कोई सखी श्यामसुन्दर को मक्खन अपने हाथ व खिलाती है, कोई लजाती है तो अपने हाथ से खा लेते हैं निई मुँह से रोकती है पर मन से चाहती है उस गोपी के क्खन को अन्तर्यामी श्यामसुन्दर लूट-लूट कर खाते हैं। खी हँस-हँस कर श्यामसुन्दर से अपने आप बातें करती है। नई लजाती है तो उससे श्यामसुन्दर स्वयं बातें करते हैं। रुजनों के शासन के कारण घर से नहीं निकलने पाती। कृपालु' कहते हैं कि उस गोपी के घर जाकर तथा उसे छेड़ नर "चोर''जार'की उपाधि ग्रहण करते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 893-894

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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