रसिया-माधुरी · पद 9
धन-धन रसिकन-धन गोवर्धन, जाने ब्रह्म लियो बिरमाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dhana-dhana rasikana-dhana govardhana, jāne brahma liyo biramāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1धन-धन रसिकन-धन गोवर्धन, जाने ब्रह्म लियो बिरमाय।
2जेहि आश्रित असंख्य विधि, हरि, हर।
3सोऊ आश्रय लिय येहि गिरिवर।
4जेहि पूजति जलजा नित निज कर।
5सोऊ ब्रह्म संग ब्रज-परिकर, गिरिवर पूज्यो जाय।
6श्रुति-आराध्य ब्रह्म-बनवारी।
7ब्रह्माराध्या भानुदुलारी।
8प्राण एक, पै द्वै तनु धारी।
9बिहरत मंजु-निकुंज-पुंज नित, लखि कमला ललचाय।
10कोउ कर जोग, जुगुत वनवासी।
11कोउ मुक्ति -हित सेवत कासी।
12लखि दोउन मोहिं आवति हाँसी।
13मूर्तिमान नगराज नाग तजि, बाँबी हित भरमाय।
14जहाँ वेद नित देत बुहारी।
15फिरत शंभु गोपी-तनुधारी।
16रज याचत विधि बने भिखारी।
17जहँ बनि दासी करति खवासी, मुक्ति, मुक्ति -हित आय।
18मरकत-मणिमय परम-प्रकासी।
19लजवत अमित-इंदु छवि-रासी।
20लखि सिहात बैकुंठ-विलासी।
21ब्रज-मंडल-मंडन जन-रंजन, खंडन-मद सुरराय।
22पुंज-निकुंजनि-मंजुलताई।
23लखि विधि-विधिताहू सकुचाई।
24मध्य मानसी-गंग सुहाई।
25राधा-कुंड आदि की महिमा, वरणत वाणि लजाय।
26जो रस निगम"अगम"कहि गायो।
27सो गोवर्धन-गलिन बहायो।
28रसिक-कृपा बिनु कोउ न पायो।
29हम “कृपालु” गिरिराज-भरोसे, निर्भय रहत सदाय॥
हिन्दी भावार्थ
प्रेम-रस के रसिकों का जीवनधन-स्वरूप गोवर्धनधाम बार-बार धन्य है। जिसने सच्चिदानन्द-ब्रह्म-श्रीकृष्ण को भी अपने वश में कर लिया है। जिन अनंतकोटि ब्रह्मांडनायक पूर्णतम-पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के आश्रित अगणित ब्रह्मा, विष्णु, शंकर रहते हैं, उन श्रीकृष्ण ने भी इसी गोवर्धन का आश्रय लिया था। जिन त्रिपाद-विभूषित भगवान् के चरणों को महालक्ष्मी स्वयं अपने हाथों से पूजती हैं, उन्हीं पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण ने अपने समस्त ब्रजवासियों के साथ इस गोवर्धन की पूजा की थी। वेद ब्रह्म-श्रीकृष्ण की उपासना करते हैं एवं ब्रह्म-श्रीकृष्ण लीला प्रेम माधुरी में श्रीवृषभानुनन्दिनी की उपासना करते हैं। यद्यपि सिद्धान्त से तो इन दोनों के दो शरीर होते हुए भी प्राण एक ही हैं। ये दोनों राधा कृष्ण इस गोवर्धन की सुन्दर लता-कुंजों में निरन्तर दिव्य रास-विहार किया करते हैं, जिसे देखकर महालक्ष्मी भी इस रस का पान करने के लिये ललचाती हैं। संसार में कोई मुक्ति के लिए वन में जाकर अष्टांग योग की साधना करता है एवं कोई काशी में देह त्याग करता है। इन दोनों ही अल्पज्ञों को देखकर मुझे हँसी आती है। ये लोग मूर्तिमान् गोवर्धन नाग को छोड़कर चारों ओर नागों के रहने के घर (बाँबी) के लिये भटकते फिरते हैं। जिस गोवर्धन-धाम में चारों वेद भी झाड़ लगाते हैं एवं जहाँ भगवान् शंकर भी गोपी शरीर धारण करके दिव्य रास के लिए दौड़े आते हैं एवं जिस गोवर्धन धाम में मुक्ति भी अपनी मुक्ति के लिए दासी बनकर सेवा करती है। जो गोवर्धन-धाम मरकत मणियों से जटित है एवं परम प्रकाश करने वाला है तथा जो करोड़ों चंद्रमा की रूप-माधुरी को लज्जित करता है एवं जिसके माधुर्य को देखकर बैकुण्ठाधीश महाविष्णु भी अपने लोक के सुख को फीका समझकर संकुचित होते हैं। वह गोवर्धनधाम ब्रजवासियों का आभूषण एवं रसिकों को आनन्द देने वाला तथा सुरपति इन्द्र के भी मद को चूर्ण करने वाला है। जिस गोवर्धनधाम की सुन्दर लता-कुंजों की सुन्दरता को देखकर ब्रह्म की कारीगरी भी लज्जित होती है एवं जिस गोवर्धनधाम के मध्य में मानसी गंगा तथा राधाकुण्ड, कृष्णकुण्ड आदि सुशोभित हो रहे हैं। जिनके माहात्म्य को वर्णन करने में वाणी अथवा सरस्वती भी लज्जित होती है। जिस रस को वेदों ने अप्राप्य बताया है, वही रस इस गोवर्धन की गली-गली में श्रीराधाकृष्ण द्वारा बहाया गया है, किन्तु रसिकों की कृपा बिना उस रस को आज तक कोई नहीं पा सका। 'कृपालु' कहते हैं कि हम तो उस दिव्य चिन्मय गोवर्धन धाम की शरणागति के सहारे सदा ही निर्भय रहते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 896-897