रसिया-माधुरी · पद 10
धन-धन रसिकन-धन वृन्दावन, जाकी महिमा वरनि न जाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dhana dhana rasikana-dhana vṛindāvana, jākī mahimā varani na jāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1धन-धन रसिकन-धन वृन्दावन, जाकी महिमा वरनि न जाय।
2निर्गुण, सगुण-ब्रह्म ते न्यारो।
3कोटि ब्रह्म-सुख जापै वारो।
4जहँ विहरत नित प्यारी-प्यारो।
5लखि सुख, तजि बैकुंठ विष्णु गये, क्षीर-सिन्धु सकुचाय।
6जनकादिक येहि विपिन मझारी।
7केकी, कीर, कोक तनु धारी।
8फिरत समाधि-उपाधि बिसारी।
9नव-निकुंज सुख-पुंज मंजु बिच, पिय नवरस हुलसाय।
10वृन्दावन रसिकन-रजधानी।
11जहँ राधारानी ठकुरानी।
12पाँचहुँ मुक्ति भरति जहँ पानी।
13कर मींजति ठाढ़ी कमला सी, मन ही मन पछिताय।
14माया-मुक्त सिद्ध-सन्यासी।
15जहँ बनि बेलि, विटप सुखरासी।
16लै वरदान एक अभिलासी।
17राधा-सहचरि-चरण-रेणु उड़ि, कबहुँ परै तनु आय।
18संतत शरद-वसंत-विलासी।
19विकसित नित नव-कुसुम-सुवासी।
20गुंजत भृंग मंजु-मधु-भाषी।
21महा-प्रलयहूँ लय नहिं जाको, जहँ बिधि-बुधि भरमाय।
22मणिमय-दिव्य-भूमि-वर-बाँकी।
23ललित-लता-कुंजन की झाँकी।
24लाजत लखि"नन्दन"छवि जाकी।
25ताल-तमाल-रसाल-साल जहँ"राधे राधे"गाय।
26जो रस"वेद"बिन्दु नहिं पायो।
27सो मिलि-अलिन गलिन बरसायो।
28सोइ जान्यो जेहि रसिक जनायो।
29माया, काल न व्यापे जामे, मो “कृपालु” मन भाय॥
हिन्दी भावार्थ
रसिकों के जीवनधन-स्वरूप चिन्मय श्रीवृन्दावन धाम को बार-बार धन्य है। उसकी महिमा का वर्णन कौन कर सकता है। निराकार-ब्रह्म एवं साकार-ब्रह्म (महाविष्णु के बैकुंठ लोक का सुख) के सुखों से भी इस वृन्दावन का सुख निराला है। जिस सुख पर करोड़ों ब्रह्मानन्द के सुख न्यौछावर किये जा सकते हैं। जहाँ निरंतर ही प्रिया-प्रियतम दिव्य विहार करते हैं। जिस सुख को देखकर बैकुंठ-नायक भी लज्जा के मारे अपने बैकुंठ लोक को छोड़कर क्षीर-सागर में जाकर से गये हैं। जिस वृन्दावन में नित्य जीवन्मुक्त सनकादिक परमहंस भी मोर, तोते एवं चकवा, चकई पक्षियों के शरीर धारण करके रहते हैं एवं अपनी निर्विकल्प समाधि को भी इस रस क बाधक समझ कर भुला देते हैं, नवीन लताओं के कुंज में निरंतर ही नित्य नूतन ब्रज-रस माधुरी पान करते हैं। बृन्दावन रसिकों की राजधानी है। जहाँ की महारानी स्वामिनं राधिका जी हैं। जहाँ साष्टि, सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य एव सायुज्य ये पाँचों प्रकार की मुक्तियाँ दासी बनकर पानी भर करती हैं। जहाँ महालक्ष्मी का भी प्रवेश नहीं है एवं महालर्क्ष्म इस वृन्दावन के बाहर खड़ी-खड़ी हाथ मींजती रहती हैं। जहाँ गुणातीत, सिद्ध, संन्यासी लोग लता, वृक्ष बनकर केवल एक ही इच्छा से वरदान लेकर रहते हैं कि कभी किशोरी जी की सखियों की चरण-धूलि उड़कर हमारे ऊपर भी पड़ जाय। जहाँ शरदऋतु एवं वसंतऋतु सदा ही निवास करती हैं। जहाँ नित्य नये सुगंधित फूल फूले रहते हैं। जिन फूलों पर भौरों के झुण्ड मधुर वाणी में गुंजार किया करते हैं। जिस बुन्दावन धाम का महाप्रलय में भी नाश नहीं होता एवं जिसकी अलौकिकता देखकर ब्रह्मा की बुद्धि भ्रम में पड़ जाती है। जहाँ की पृथ्वी मणियों से जटित अत्यन्त ही सुन्दर है। जहाँ की लताओं के कुंज की झाँकी अत्यन्त ही मनोहारिणी है। जसके सौंदर्य को देख कर इन्द्र का दिव्य नंदनवन भी लज्जित होता है। जहाँ ताल, तमाल, आम्र एवं साल के वृक्ष भी निरंतर राधे, राधे'गाया करते हैं। जिस ब्रज-रस-माधुरी का एक बूँद वेदों को भी प्राप्त न हो पाया उसी रस को प्रिया-प्रियतम ने सखियों के साथ मिलकर बुन्दावन को गलियों में भरपूर प्रवाहित किया किन्तु इस रस को वही जान सकता है जिस पर रसिकों की कृपा हो जाय। कृपालु' कहते हैं कि जिस दिव्य वृन्दावन धाम में माया एवं काल का प्रवेश नहीं है, वही दिव्य वृन्दावन मेरे मन को अच्छा लगता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 897-900