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RADHEY RADHEY

रसिया-माधुरी · पद 11

बलिहारी है तिहारी बनवारी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: balihārī hai tihārī banavārī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1बलिहारी है तिहारी बनवारी।

2चह सनकादिन साधि समाधिन, झाँकन टुक झाँकी प्यारी।

3पै तहँ जात लजात, जात पुनि, जोरन पनिहारिनि यारी।

4इन्द्राणी, रुद्राणी, वाणी, ब्रह्माणी, रति मतवारी।

5पै धनि-धनि मनमोहन तोहिं जो, मनभावति कुबरिहिं नारी।

6सुनि “कृपालु” ब्रजनारिन गारिन,"बलिहारी"कह बलिहारी॥

हिन्दी भावार्थ

एक रसिक कहता है कि-हे श्यामसुन्दर! हम तुम्हारी रसमयी अटपटी लीला पर बलिहार जाते हैं। बड़े-बड़े जीवन्मुक्त परमहँस सनकादिक निर्विकल्प समाधि में तुम्हारी थोड़ी-सी झाँकी का दर्शन चाहते हैं, किन्तु कदाचित् तुम्हें उस समाधि में जाने में लज्जा लगती है, किन्तु अशिक्षित, पानी भरने वाली ब्रजबालाओं से छेड़खानी करने के लिए उनके पीछे-पीछे जाकर उनसे अपमानित होने में सुख पाते हो। इन्द्राणी, भवानी सरस्वती, ब्रह्माणी, रति आदि तुम्हारे प्रेम-कटाक्ष के लिए तरसती रहती हैं, किन्तु हे लीलाधारी! तुमको बलिहारी है जो कुब्जा सरीखी प्रेयसी को सुन्दरी बना कर उसे परमानन्द प्रदान करते हो।'कृपालु' कहते हैं कि हम तो उस झाँकी पर बलिहार जाते हैं जब श्यामसुन्दर ब्रजांगनाओं की कटू गालियों को सुनकर 'बलिहार'कहते हुए बलिहार जाते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 900-901