# धन-धन रसिकन-धन गोवर्धन, जाने ब्रह्म लियो बिरमाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0974-M20-K009
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: रसिया-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 9
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 454–455

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>धन-धन रसिकन-धन गोवर्धन, जाने ब्रह्म लियो बिरमाय।  
<a id="line-2"></a>जेहि आश्रित असंख्य विधि, हरि, हर।  
<a id="line-3"></a>सोऊ आश्रय लिय येहि गिरिवर।  
<a id="line-4"></a>जेहि पूजति जलजा नित निज कर।  
<a id="line-5"></a>सोऊ ब्रह्म संग ब्रज-परिकर, गिरिवर पूज्यो जाय।  
<a id="line-6"></a>श्रुति-आराध्य ब्रह्म-बनवारी।  
<a id="line-7"></a>ब्रह्माराध्या भानुदुलारी।  
<a id="line-8"></a>प्राण एक, पै द्वै तनु धारी।  
<a id="line-9"></a>बिहरत मंजु-निकुंज-पुंज नित, लखि कमला ललचाय।  
<a id="line-10"></a>कोउ कर जोग, जुगुत वनवासी।  
<a id="line-11"></a>कोउ मुक्ति -हित सेवत कासी।  
<a id="line-12"></a>लखि दोउन मोहिं आवति हाँसी।  
<a id="line-13"></a>मूर्तिमान नगराज नाग तजि, बाँबी हित भरमाय।  
<a id="line-14"></a>जहाँ वेद नित देत बुहारी।  
<a id="line-15"></a>फिरत शंभु गोपी-तनुधारी।  
<a id="line-16"></a>रज याचत विधि बने भिखारी।  
<a id="line-17"></a>जहँ बनि दासी करति खवासी, मुक्ति, मुक्ति -हित आय।  
<a id="line-18"></a>मरकत-मणिमय परम-प्रकासी।  
<a id="line-19"></a>लजवत अमित-इंदु छवि-रासी।  
<a id="line-20"></a>लखि सिहात बैकुंठ-विलासी।  
<a id="line-21"></a>ब्रज-मंडल-मंडन जन-रंजन, खंडन-मद सुरराय।  
<a id="line-22"></a>पुंज-निकुंजनि-मंजुलताई।  
<a id="line-23"></a>लखि विधि-विधिताहू सकुचाई।  
<a id="line-24"></a>मध्य मानसी-गंग सुहाई।  
<a id="line-25"></a>राधा-कुंड आदि की महिमा, वरणत वाणि लजाय।  
<a id="line-26"></a>जो रस निगम"अगम"कहि गायो।  
<a id="line-27"></a>सो गोवर्धन-गलिन बहायो।  
<a id="line-28"></a>रसिक-कृपा बिनु कोउ न पायो।  
<a id="line-29"></a>हम “कृपालु” गिरिराज-भरोसे, निर्भय रहत सदाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्रेम-रस के रसिकों का जीवनधन-स्वरूप गोवर्धनधाम बार-बार धन्य है। जिसने सच्चिदानन्द-ब्रह्म-श्रीकृष्ण को भी अपने वश में कर लिया है। जिन अनंतकोटि ब्रह्मांडनायक पूर्णतम-पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के आश्रित अगणित ब्रह्मा, विष्णु, शंकर रहते हैं, उन श्रीकृष्ण ने भी इसी गोवर्धन का आश्रय लिया था। जिन त्रिपाद-विभूषित भगवान् के चरणों को महालक्ष्मी स्वयं अपने हाथों से पूजती हैं, उन्हीं पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण ने अपने समस्त ब्रजवासियों के साथ इस गोवर्धन की पूजा की थी। वेद ब्रह्म-श्रीकृष्ण की उपासना करते हैं एवं ब्रह्म-श्रीकृष्ण लीला प्रेम माधुरी में श्रीवृषभानुनन्दिनी की उपासना करते हैं। यद्यपि सिद्धान्त से तो इन दोनों के दो शरीर होते हुए भी प्राण एक ही हैं। ये दोनों राधा कृष्ण इस गोवर्धन की सुन्दर लता-कुंजों में निरन्तर दिव्य रास-विहार किया करते हैं, जिसे देखकर महालक्ष्मी भी इस रस का पान करने के लिये ललचाती हैं। संसार में कोई मुक्ति के लिए वन में जाकर अष्टांग योग की साधना करता है एवं कोई काशी में देह त्याग करता है। इन दोनों ही अल्पज्ञों को देखकर मुझे हँसी आती है। ये लोग मूर्तिमान् गोवर्धन नाग को छोड़कर चारों ओर नागों के रहने के घर (बाँबी) के लिये भटकते फिरते हैं। जिस गोवर्धन-धाम में चारों वेद भी झाड़ लगाते हैं एवं जहाँ भगवान् शंकर भी गोपी शरीर धारण करके दिव्य रास के लिए दौड़े आते हैं एवं जिस गोवर्धन धाम में मुक्ति भी अपनी मुक्ति के लिए दासी बनकर सेवा करती है। जो गोवर्धन-धाम मरकत मणियों से जटित है एवं परम प्रकाश करने वाला है तथा जो करोड़ों चंद्रमा की रूप-माधुरी को लज्जित करता है एवं जिसके माधुर्य को देखकर बैकुण्ठाधीश महाविष्णु भी अपने लोक के सुख को फीका समझकर संकुचित होते हैं। वह गोवर्धनधाम ब्रजवासियों का आभूषण एवं रसिकों को आनन्द देने वाला तथा सुरपति इन्द्र के भी मद को चूर्ण करने वाला है। जिस गोवर्धनधाम की सुन्दर लता-कुंजों की सुन्दरता को देखकर ब्रह्म की कारीगरी भी लज्जित होती है एवं जिस गोवर्धनधाम के मध्य में मानसी गंगा तथा राधाकुण्ड, कृष्णकुण्ड आदि सुशोभित हो रहे हैं। जिनके माहात्म्य को वर्णन करने में वाणी अथवा सरस्वती भी लज्जित होती है। जिस रस को वेदों ने अप्राप्य बताया है, वही रस इस गोवर्धन की गली-गली में श्रीराधाकृष्ण द्वारा बहाया गया है, किन्तु रसिकों की कृपा बिना उस रस को आज तक कोई नहीं पा सका। 'कृपालु' कहते हैं कि हम तो उस दिव्य चिन्मय गोवर्धन धाम की शरणागति के सहारे सदा ही निर्भय रहते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 896-897

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
