रसिया-माधुरी · पद 7
देखो देखो री, ग्वाल-बालन यारी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekho dekho rī, gwāla-bālana yārī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1देखो देखो री, ग्वाल-बालन यारी।
2इन ग्वालन मुख छोरि-छोरि हरि, खात कौर कहि बलिहारी।
3रिझवत खेल जिताय सखन को, घोड़ा बनि बनि बनवारी।
4कबहुँक देत रिसाय सखन कहँ, पुनि तिन सुनत मधुर गारी।
5नख धार्यो गोवर्धन-गिरि जब, सखन कह्यो हम गिरिधारी।
6सो “कृपालु” छवि अनुपम जब कह, द्वै तातरु द्वै महतारी॥
हिन्दी भावार्थ
एक रसिक कहता है-अरे! इन निरक्षर-भट्टाचार्य ग्वालबालों के प्रेम की महिमा तो देखो। इन ग्वालबालों के मुख से छीन-छीन कर उच्छिष्ट कौर स्वयं भगवान् विभोर होकर खा रहे हैं। कभी इन सखाओं को खेल में जिता देते हैं और स्वयं उनका घोड़ा बनकर उन्हें सुख पहुँचाते हैं और कभी उन्हें करुद्ध कर देते हैं एवं उनकी परमात्मीयतायुक्त साधिकार गाली सुनकर आनन्दित होते हैं। जब श्यामसुन्दर ने गोवर्धन पहाड़ उठाया तब ग्वालबालों ने कहा कि कन्हैया ने तो केवल एक नाखून से ही छू रखा था, वास्तव में गिरिधारी तो हम लोग हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हमें तो वह छवि सबसे मधुर लगती है जब सखाओं द्वारा, दो बाप एवं दो माता-वाला कहे जाने पर रोदनशील बन जाती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 892