रसिया-माधुरी · पद 6
जारे जारे, जार जा, हरजाई।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jā re jā re, jāra jā, harajāī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1जारे जारे, जार जा, हरजाई।
2लखु वनमाल लाल कुमकुम तोहिं, चन्द्रावलि अलि बिलमाई।
3तू छलिया छल जानि लई भल, लाज न इत आवत आई।
4काहू को तू हृदय लगावत, काहू बातन भरमाई।
5मो कहँ शंक भई वाई दिन, जा दिन वा हँसि बतराई।
6कह “कृपालु” यह सकल जीव कहँ, एक परमपति हरि-राई॥
हिन्दी भावार्थ
श्री वृषभानुनन्दिनी राधिका जी रतिरस चिह्नं से युत्त श्यामसुन्दर को देख-देख कर दिव्य-ईर्ष्यायुक्त बचनों द्वार कहती हैं-''अरे! ओ लम्पट श्यामसुन्दर! तू हमारे सामने र हट जा। कदाचित् तूने अपनी वनमाला में चन्द्रावलि के आलिंगः के परिणाम स्वरूप लगा हुआ, कुमकुम नहीं देखा है। मैं भली-भाँति जान लिया है कि तू घोर कपरी है। तुझे ऐस अवस्था में यहाँ आने में भी लज्जा नहीं आई। तू किसी को त हृदय से लगाता है एवं किसी से चाटुकारिता की बातें-माः उ है। मुझे तो उसी दिन अनुमान लग गया था जिस दिन मेरे सामने चन्द्रावलि तुझसे हँस-हँस कर बातें कर रही थी। कृपालु' कहते हैं, हे किशोरी जी! यह श्यामसुन्दर तो समस्त विश्व के समस्त जीवों का एकमात्र प्रियतम है, अतएव आपको क्षमा कर देना चाहिए।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 891-892