# देखो देखो री, ग्वाल-बालन यारी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0972-M20-K007
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: रसिया-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 7
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 452–452

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>देखो देखो री, ग्वाल-बालन यारी।  
<a id="line-2"></a>इन ग्वालन मुख छोरि-छोरि हरि, खात कौर कहि बलिहारी।  
<a id="line-3"></a>रिझवत खेल जिताय सखन को, घोड़ा बनि बनि बनवारी।  
<a id="line-4"></a>कबहुँक देत रिसाय सखन कहँ, पुनि तिन सुनत मधुर गारी।  
<a id="line-5"></a>नख धार्यो गोवर्धन-गिरि जब, सखन कह्यो हम गिरिधारी।  
<a id="line-6"></a>सो “कृपालु” छवि अनुपम जब कह, द्वै तातरु द्वै महतारी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक रसिक कहता है-अरे! इन निरक्षर-भट्टाचार्य ग्वालबालों के प्रेम की महिमा तो देखो। इन ग्वालबालों के मुख से छीन-छीन कर उच्छिष्ट कौर स्वयं भगवान् विभोर होकर खा रहे हैं। कभी इन सखाओं को खेल में जिता देते हैं और स्वयं उनका घोड़ा बनकर उन्हें सुख पहुँचाते हैं और कभी उन्हें करुद्ध कर देते हैं एवं उनकी परमात्मीयतायुक्त साधिकार गाली सुनकर आनन्दित होते हैं। जब श्यामसुन्दर ने गोवर्धन पहाड़ उठाया तब ग्वालबालों ने कहा कि कन्हैया ने तो केवल एक नाखून से ही छू रखा था, वास्तव में गिरिधारी तो हम लोग हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हमें तो वह छवि सबसे मधुर लगती है जब सखाओं द्वारा, दो बाप एवं दो माता-वाला कहे जाने पर रोदनशील बन जाती है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 892

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
