रसिया-माधुरी · पद 2
आजु निकुंज-मंजु बिच पिउ को, प्यारी निज कर करति सिंगार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju nikuñja-mañju bicha piu ko,
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आजु निकुंज-मंजु बिच पिउ को, प्यारी निज कर करति सिंगार।
2"राखेहु श्याम! सदा रुचि मोरी।
3आजु चाह उपजी उर थोरी।
4तुमहिं बनाऊँ नवल-किशोरी।
5"जस तव रुचि तस करिय किशोरी, हौं रुचि-दास तिहार।
6मेलि फुलेल सुघर वर-बेनी।
7सुमन-अलंकृत अति सुख-देनी।
8जनु अलि अवलिन अमित निसेनी।
9शीश-फूल जनु रवि सुहाग को, प्रकट्यो है तनु धार।
10मोतिन-माँग रची मनभाई।
11मृग-मद तिलक भाल छबि छाई।
12मध्य बिंदु-कुमकुम सरसाई।
13श्रवनन तरल-तरोना झलकत, भौं लजवत धनु-मार।
14चंचल-नैन सहज कजरारे।
15तामे अंजन-रुचिर सँवारे।
16बेसर-सुघर नासिका धारे।
17लाल-अधर-लाली लखि लाली, उर आनंद अपार।
18जरिन-किनार नील-पट-सारी।
19उर-अँगिया कुसुम्भि-रँगवारी।
20दै अंचल मुख हँसति निहारी।
21दुलरी-कुंदन, लरी-मोतियन, विविध-मणिन उर-हार।
22मणिमय-वलय-चुरी कर सोहै।
23रतन-खँचित पहुँची मन मोहै।
24पाणि-अरुणिमा मेहँदी को है।
25नगन-जटित कर अँगुरिन मुँदरिन, चंद्र-लजावनि-हार।
26नाभि-सरोवर त्रिवलिन-धारा।
27कटि-तनु जघन विशाल सुढारा।
28किंकिनि-धुनि सुनि मुनि-मन-हारा।
29गज-मद-मत्त लजत गति लखि लखि, मृदु पायल झनकार।
30रँग-भीने जावक पग सोहत।
31नख-दुति कोटि-चंद्र मन मोहत।
32नहिं अघाति प्यारी छवि जोहत।
33लखि “कृपालु” श्रृंगार धाय दिय, भाल दिठौना डार॥
हिन्दी भावार्थ
आज सुन्दर वृन्दावन के कुंज में किशोरी जी अपने हाथों से प्रियतम श्यामसुन्दर का श्रृंगार कर रहीं हैं। किशोरी जी कहती हैं, हे श्यामसुन्दर! तुमने सदा ही हमारी र पूर्ण की है, आज भी हमारे हृदय में एक इच्छा है कि तुम्हारा शृंगार करके नवलकिशोरी बनाऊँ।'प्रियतम कहते हैं हे किशोरी जी! मैं तो तुम्हारी इच्छा का ही दास हूँ, अतएव तुम्हारी जैसी भी इच्छा हो'करो! किशोरी जी ने शृंगार प्रारम्भ किया, सिर में सुगंधित तेल लगाकर क्या ही सुन्दर वेणी गूँथी है। उस वेणी में विविध प्रकार के फूलों का शृंगार भी किया है। वेणी के बाल इतने सुन्दर एवं घुँघराले हैं मानो भौरों के झुण्डों की अनन्त सीढ़ियां बनी हों। शीशफूल इस प्रकार सुशोभित हो रहा है मानो सुहाग का सूर्य मूर्तिमान शरीर धारण करके प्रकट हुआ हो। मोतियों की लड़ों से युक्त क्या ही सुन्दर माँग मन को मोहित कर रही है। ललाट में कस्तूरी के तिलक की छटा क्या ही निराली है। ललाट के बीच में कुमकुम की बिंदी क्या ही चित्त को चुराने वाली है। कानों में हिलता हुआ कर्णफूल चमक रहा है एवं भौंहें कामदेव के धनुष को भी लज्जित करने वाली हैं। आँखें अत्यन्त चंचल एवं स्वाभाविक ही काली हैं, फिर उनमें लगा हुआ अंजन क्या ही सुन्दर लगता है। नासिका में सुन्दर बेसर धारण किये हुए हैं एवं उनके अधरों की लालिमा बरबस किशोरी जी को आनन्द-विभोर कर रही है। जरी के काम की किनारी से युक्त नीली साड़ी पहने हुए हैं एवं कुसुंभी रंग की चोली धारण कर रखी है! किशोरीजी अपने मुख पर आँचल की ओट देकर चुपके से हँस रही हैं। कुन्दों की दुलरी, मोतियों एवं अनेक प्रकार की मणियों के हार गले में पहने हुए हैं। र के कंकण तथा चूड़ी हाथ में सुशोभित हो रही हैं। रत्नों के काम से युक्त पहुँची मन को मोहित कर रही हैं। हाथों में मेहँदी की लालिमा सुशोभित है। रंग-बिरंगे नगों से जड़ी हुई हाथों में अँगूठियाँ चन्द्रमा को भी लज्जित करने वाली हैं। नाभि-रूपी तालाब में तीन वलियों रूपी धारा है। कमर पतली एवं ढाल से युक्त मोटी जाँघें हैं। मधुर किंकिणी की ध्वनि मुनियों के मन को भी मोहित करने वाली है। मतवाला हाथी भी उनकी चाल को देखकर लज्जित हो रहा है एवं उनके पैरों में पायल की मधुर ध्वनि हो रही है। पैरों में सुन्दर रंग की महावर लगी है एवं नखों की कांति से करोड़ों चंद्रमा भी फीके लगते हैं। इस प्रकार शृंगार करके किशोरी जी रूप-माधुरी का पान करते हुए एकटक देखती हुई भी तृप्त नहीं हुई। 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार अनुपम शृंगार देखकर मैंने शीघ्रता से दौड़कर उन के ललाट में एक काला रीका दिठौना के रूप में लगा दिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 883-886