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RADHEY RADHEY

रसिया-माधुरी · पद 1

अटको दृग, लखि नटखट पट को।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aṭako dṛiga, lakhi naṭakhaṭa paṭa ko

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अटको दृग, लखि नटखट पट को।

2कारी अनियारी घुँघरारी, को बरनै अटपट लट को।

3हाटक मुकुट करत जनु त्राटक, तापर मोर-मुकुट अटको।

4झलमल भल चल चंचल कुंडल, चपल दृगंचल को लटको।

5लखि मन-भावन हावन-भावन, को मन भाव न नटखट को।

6कह “कृपालु” लखि रति-रस-रंगनि, मनहुँ अनंगनि अटकि टको॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर के दुपट्टे को देखकर मेरी आँखें उसमें अटक गईं। काली-काली अनोखी घुँघराली घनी अलकों की छवि तो सर्वथा अनिर्वचनीय है। सुवर्ण का मुकुट तो मानो टक करता है, फिर उस पर मोर-मुकुट की अटकनि तो और भी विलक्षण है। कान के चंचल कुण्डल झलमलाते हुए अत्यन्त प्यारे लगते हैं। चंचल आँखों के कटाक्ष का तो कहना ही क्या है! उनके रस भरे हाव-भाव को देखकर ऐसा कौन है जिसका मन भाव-विभोर न हो जाय। 'कृपालु' कहते हैं उनकी अन्तरंग रतिरस लीलाओं को देख कर तो कामदेव भी मूर्च्छित हो गया।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 882-883