विरह-माधुरी · पद 214
हो रसिया! कस सुरति बिसारी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ho rasiyā! kasa surati bisārī?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हो रसिया! कस सुरति बिसारी।
2लोक, वेद, कुल कानि आनि सब, तजि आई पिय शरण तिहारी।
3मग जोहत अँखियाँ पथराई, हारी हेरि बिपिन बनवारी।
4तारे गिनत जात सब यामिनि, पलक एक युग सम लग भारी।
5निर्मोही! कस मोहिं मोहि अब, तड़पावत बेपीर मुरारी।
6जियन न देत, लेत नहि प्रानहुँ, दुहूँ भाँति अति विपति हमारी।
7अब “कृपालु” मो कहँ तजि माधव, कूबरि वरि निज करि उर धारी॥
हिन्दी भावार्थ
(एक विरहिणी प्रियतम श्यामसुन्दर के वियोग में विलाप करती हुई कहती है।) हे रसिकशिरोमणि श्यामसुन्दर! तुमने मेरी सुधि क्यों भुला दी है? मैं तो लोक, वेद एवं कुल की मर्यादा आदि सब कुछ छोड़कर तुम्हारी शरण में आयी हूँ। हे श्यामसुन्दर! तुम्हारी प्रतीक्षा करते-करते मेरी आँखें पथरा गयीं एवं वन-वन में तुम्हें दूँढकर मैं हार गयी। हे प्रियतम! तुम्हारे बिना तारे गिन गिनकर सारी रात बिताती हूँ एवं एक-एक क्षण युग के समान भारी लगता है। हे निष्ठुर श्यामसुन्दर! तुमने मुझे मोहित करके अब क्यों तड्पाने की ठानी है? अरे बेपीर! तुम न तो चैन से जीने देता है और न प्राण ही लेता है। दोनों ही प्रकार से मुझे महान् कष्ट है। 'कृपालु' कहते हैं कि अब तो श्यामसुन्दर ने मुझे छोड़कर कुब्जा का वरण करके एवं उसे अपनी बनाकर अपने हृदय में रख लिया है, इससे मुझे भूल गये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 880-881