विरह-माधुरी · पद 213
हाय! हिय, कैसो तव अक्रूर!।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya! hiya, kaiso tava akrūra!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय! हिय, कैसो तव अक्रूर!।
2ब्रज बनितान प्रान-जीवन धन, जनि ले जा रे क्रूर।
3पुनि-पुनि हा हा खाउँ जाउँ बलि, सिर धरि तव पग-धूर।
4मांगूँ भीख पायँ परि दै दे, मम सुहाग-सिंदूर।
5सहि नहिं सकत विरह दुख पिय भये, पलक ओटहूँ दूर।
6रखु “कृपालु” निज नाम-लाज तू, बूड़िय ब्रज दुख-पूर॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर के मथुरा गमन के समय अक्रूर को कोसती हुई गोपांगनाएँ कहती हैं- ) अरे अक्रूर! तेरा हृदय कितना कठोर है? अरे अक्रूर! ब्रजांगनाओं के प्राणवल्लभ को मत ले जा। हम लोग बार-बार हा हा खा रही हैं एवं तेरे चरणों की धूल को मस्तक पर धारण कर रहीं हैं। हम लोग तुझसे अपने सुहाग के सिन्दूर की भीख माँग रहीं हैं। प्रियतम के पलक-ओट भी दूर होने पर हम लोग उनके विरह को नहीं सह सकतीं ''। 'कृपालु' कहते हैं ''अरे अङ्कूर! तू अपने नाम को लज्जा रख। ( अक्रूर शब्द का अर्थ है दयालु) नहीं तो सम्पूर्ण ब्रज असह्य दुःख की बाढ़ में डूब जायगा''।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 879-880