विरह-माधुरी · पद 212
हाय! सखि, कैसे ह्वै गये श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya! sakhi, kaise hvai gaye shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय! सखि, कैसे ह्वै गये श्याम।
2जो आधे-पलहूँ नहिं रहि सक, बिनु राधे इक ठाम।
3सो ऐसे बेपीर भये कस, वीर! तज्यो ब्रजबाम।
4तजि देइहैं पिय प्रीति-रीति अस, होति प्रतीति न नाम।
5हौं भल जान न मान सखी यह, चैन कान्ह उर धाम।
6होत “कृपालु” कबहुँ उर संशय, हरि हैं आत्माराम॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर के वियोग में गोपियों का विलाप-) हाय सखि! श्यामसुन्दर अब कैसे हो गये हैं? जो किशोरी जी के बिना आधे क्षण में ही बेचैन हो जाते थे, वे ऐसे निष्ठुर कैसे हो गये जो किशोरी जी सहित समस्त ब्रजांगनाओं का परित्याग कर दिया? प्रियतम प्रीति की रीति को इस प्रकार त्याग देंगे, यह विश्वास नाम-मात्र को भी नहीं होता। अरी सखि! मैं भली-भाँति जानती हूँ, अतएव यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि श्यामसुन्दर चैन से होंगे'"। 'कृपालु' कहते हैं कि फिर भी कभी-कभी हृदय में यह शंका हो जाती है कि श्यामसुन्दर तो आत्माराम हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 878-879