विरह-माधुरी · पद 211
हाय यह, कैसी लागि बलाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya! yaha, kaisī lāgi balāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय यह, कैसी लागि बलाय।
2ब्रज मंडल कन-कन महँ छिन-छिन, श्यामहिं श्याम लखाय।
3सोइ रति रस-बतियन दिन रतियन, कानन माहिं सुनाय।
4सोइ पिय परस सरस रस रह तनु, रोम रोम महँ छाय।
5सोइ रस रसनहुँ, गंध नासिकहुँ, विवस दिवस-निशि पाय।
6कह “कृपालु” तन-मन-प्रानन सोइ, रह घनश्याम समाय॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर के वियोग में सम्पूर्ण विश्व को श्यामसुन्दरमय देखती हुई गोपी कहती है-''हाय दैया! मुझे यह कौन सी भयानक बला लग गई है जो सम्पूर्ण ब्रजमण्डल के कण-कण में प्रतिक्षण श्याम ही श्याम दिखाई पड़ते हैं कानों में दिन-रात वही अन्तरंग प्रेमरस की बातें सुनाई पड़ती हैं। रोम-रोम में वही प्रियतम का मधुर स्पर्श रस समाया हुआ है। रसना में भी श्यामसुन्दर का दिव्य अधरामृत रस एवं नासिका में भी श्यामसुन्दर की दिव्य गन्ध दिन-रात बरबस प्राप्त होती है''। 'कृपालु' कहते हैं कि इस सखी के तन मन, प्राण सबमें श्यामसुन्दर समा गये हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 878