विरह-माधुरी · पद 210
हाय! मोहिं, पिय बिनु कछु न सुहाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya! mohiṁ, piya binu kachhu na suhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय! मोहिं, पिय बिनु कछु न सुहाय।
2मंद मंद मुसकान कान्ह की, रोम रोम रहि छाय।
3बनत न भनत अनत इन बातन, जात न नात दुराय।
4खोई खोई सी मोहिं लखि सखि, पूछति मृदु मुसकाय।
5इत हौं लाजन मरी जात, उत, विरहा गाज गिराय।
6अब “कृपालु” पिय! कल कहँ जिय कहँ, जब हिय गयो हिराय॥
हिन्दी भावार्थ
हाय! हाय!! प्रियतम के बिना मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। प्यारे श्यामसुन्दर की मन्द-मन्द मुस्कान मेरे रोम रोम में समा गयी है। न तो इन बातों को किसी से कहते ही बनता है और न उनका प्रेम ही छुपाते बनता है। मुझे खोई खोई सी देखकर सखियाँ मुस्करा-मुस्कराकर पूछती हैं-ए री सखी! तुझे आजकल क्या हो गया है? इधर तो मैं लज्जा के मारे मरी जाती हूँ, उधर वियोग का दुःख वज्रपात के समान कष्ट दे रहा है। 'कृपालु' कहते हैं कि हे प्रियतम! अब तो एक क्षण के लिए भी चैन नहीं है क्योंकि मेरा हृदय ही तूने हर लिया है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 877-878