विरह-माधुरी · पद 209
हाय! मोहिं पल छिन विरह सतावत।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya! mohiṁ pala chhina biraha satāvata
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय! मोहिं पल छिन विरह सतावत।
2जब विरहा लै अगिनि-बान मोहिं, रोम-रोम तकि मारि जरावत।
3तब हौं विरहिणिवरुण-अस्त्र लै, भरिलोचन-जलताहि बुझावत।
4पुनि विरहा रिसियाय हाय जब, वारिद-वृंद बान लै धावत।
5तब दीरघ-निःश्वास पवन सों, बेगि धाय हौं मारि भजावत।
6पुनि विरहा ऋतुराज-साज लै, त्रिविध-समीरन बान चलावत।
7तब हौं निज उर धारि मृणालन, नागबान लै प्रान बचावत।
8इमि रन करत भूमि-तनु मधि नित, प्रान धरोहर जान न पावत।
9अब “कृपालु” पिय वेगि बचाइय, नहिं तो विरह कलंक लगावत॥
हिन्दी भावार्थ
(एक विरहिणी का दिव्य बाणं द्वारा विरह से घोर विरहिणी कहती है कि हाय! हाय!! मुझे निरन्तर ही प्रियतम यामसुंदर का वियोग सता रहा है। जब विरह अग्निबाण नेकर मेरे रोम-रोम में प्रहार करता हुआ मुझे जलाता है तब मैं मँखों से जल बरसाती हुई मानो वरुण-अस्त्र से अग्निबाण नि शान्त कर देती हूँ। पराजित विरह फिर क्रुद्ध होकर अन्यायपूर्ण ग्ध नीति से बादलों के समूह रूपी बाणों से प्रहार करता है ब मैं अपनी सांसों रूपी पवनास्त्र से शीघ्र ही उसे शान्त कर तन हूँ। फिर विरह वसन्त ऋतु को साथ लेकर शीतल मंद सुगन्धित-वायु-रूपी बाण से प्रहार करता है, तब मैं अपने वक्षःस्थल पर कमल के नालरूपी नागबाण से अपना प्राण बचाती हूँ। इस प्रकार प्रियतम की धरोहर-रूप प्राण के लिए इस शरीर रूपी रणक्षेत्र में मैं सदा ही युद्ध करती रहती हूँ किन्त कृपालु' कहते हैं कि हे प्रियतम! अब आप शीघ्र ही आकर अपनी धरोहर की रक्षा कीजिए नहीं तो विरह प्राण ले जाएगा एवं मुझ पर धरोहर मी रक्षा न कर सकने का बड़ा भारी कलंक का टीका लग जाएगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 876-877