विरह-माधुरी · पद 208
हाय मोरा, पिया बिनु जिया घबराये।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya! morā, piyā binu jiyā ghabarāye
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय मोरा, पिया बिनु जिया घबराये।
2बरसों बीत गये गये घर सों, परसों कितक विहाये।
3कहँ लौं मन समुझाउँ सखी अब, मनहूँ भये पराये।
4सुधा समान बैन सखियन के, विष सम मोहिं जनाये।
5छिन आँगन छिन बाहर भाजति, कितहूँ चैन न आये।
6कबहूँ तो “कृपालु” पिय हियहूँ,"हाय!"लगेगी जाये॥
हिन्दी भावार्थ
(जब श्यामसुन्दर गोपियों को छोड़कर मथुरा चले गये तब एक विरहिणी अपनी विरह-व्यथा को अपनी अन्तरंग सखी से बताती है।) हाय! सखी! मेरा मन प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना अत्यन्त ही घबरा रहा है। अरी सखी! उन्होंने कहा था कि परसों ही आ जायेंगे किन्तु बरसों बीत गये उनका अभी तक परसों नहीं समाप्त हुआ। अरी सखी! अपने मन को किस प्रकार एवं कहाँ तक समझाऊँ और अगर समझाऊँ भी तो वह भी तो उन्हीं के पास चला गया है, फिर हमारी बात मन समझ कैसे सकता है? मेरी परम अन्तरंग सखियों के अमृततुल्य मीठे बचन भी मुझे विष के समान प्रतीत हो रहे हैं। मैं क्षण-क्षण में खाद घर में आती हूँ कभी "प्रियतम आते होंगे ', इस आशा में भागती हुई घर के बाहर जाती हूँ किन्तु कहीं भी चैन नहीं मिलता। "कृपालु कहते हैं कि अरी विरहिणी। तू घबरा मत कभी तो प्यारे श्यामसुन्दर के हृदय में तेरी यह 'हाय! हाय! की ध्वनि अवश्य ही प्रभाव डालेगी एवं उन्हें विवश होकर आना पड़ेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 875-876