विरह-माधुरी · पद 207
हाय पिय, देइहैं अस बिसराय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya piya, deihaiṁ asa bisarāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय पिय, देइहैं अस बिसराय।
2अस विश्वास रह्यो नहिं सपनेहुँ, लखि पिय सरल सुभाय।
3जो हम ब्रजगोपिन बिनु इक छिन, रहि न सकत रह हाय।
4सो अब इतनो कठिन भयो कत, जो पातिहुँ न पठाय।
5जो यशुमति पय-पान करायो, दुलरायो नँदराय।
6श्याम “कृपालु” तिनहुँ तजि देइहैं, को अस सोचि सकाय॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर के वियोग में ब्रजवासियों का करुण अरी सखी! श्यामसुन्दर हम लोगों को इस प्रकार भुला देंगे उनके पूर्व सरल स्वभाव को देखकर हम लोगों को स्वप्न में भी ऐसा विश्वास नहीं था। जो श्यामसुन्दर ब्रजांगनाओं के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते थे, वे अब इतने कठोर हो गये हैं कि एक पत्र भी नहीं भेजा। जिस यशोदा मैया ने अपना दूध पिलाया, जिस नन्द बाबा ने विविध प्रकार के दुलार किये कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर उनको भी छोड़ सकते हैं-भला ऐसा कौन सोच सकता था।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 874-875