विरह-माधुरी · पद 206
हाय दई, यह कैसी भई री।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hāya daī! yaha kaisī bhaī rī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हाय दई, यह कैसी भई री।
2केहि विधि कासों कहूँ आपनी, जार प्रेम की बात नई री।
3देखन को छोटा अति खोटा, नँद-ढोटाहिं ठगाय गई री।
4भई लटू मैं भटू पटू ह्वै, नेकु हँसनि मन बेच दई री।
5पलक शब्द विपरीत भयो अब, विष-बेलरि उर माहिं बई री।
6सिगरो जग सूनो सो दीखत, विरह घटा नैनन उनई री।
7यह “कृपालु” पिय-प्रेम विषामृत, परम चतुर दै शीश लई री॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी सखी से कहती है कि हाय! यह तो बड़ा ही बुरा हुआ। अब इस परपुरुष-रूप श्यामसुन्दर के प्रेम की बात को किस प्रकार किसी से कहूँ। देखने में तो वह नन्द का लाल छोटा ही है, किन्तु वह इतना खोटा है कि मुझ अत्यन्त चतुर को भी ठग लिया। अरी सखी! मैं चतुर होते हुए भी थोड़ी-सी मुस्कान के ऊपर अपने मन को बेचकर उस पर दीवानी हो गयी। अब हमारे लिए एक-एक पल कल्प के समान हो गया है (पलक शब्द का उल्टा कलप) एवं हृदय में विरह की विष-बेल फैल गई है। मुझे सारा संसार शून्य-सा प्रतीत होता है, एवं विरह के बादल आँखों से आँसू बरसा रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! यह विष एवं अमूत मिला हुआ प्रेम जो तुझे मिला है वह बड़े-बड़े ज्ञानियों के लिए भी दुर्लभ है। इसको पाने के लिए तो अत्यन्त ही चतुर अपना शीश प्रदान करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 873-874