# हाय दई, यह कैसी भई री।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0957-M19-K206
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 206
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 443–443

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हाय दई, यह कैसी भई री।  
<a id="line-2"></a>केहि विधि कासों कहूँ आपनी, जार प्रेम की बात नई री।  
<a id="line-3"></a>देखन को छोटा अति खोटा, नँद-ढोटाहिं ठगाय गई री।  
<a id="line-4"></a>भई लटू मैं भटू पटू ह्वै, नेकु हँसनि मन बेच दई री।  
<a id="line-5"></a>पलक शब्द विपरीत भयो अब, विष-बेलरि उर माहिं बई री।  
<a id="line-6"></a>सिगरो जग सूनो सो दीखत, विरह घटा नैनन उनई री।  
<a id="line-7"></a>यह “कृपालु” पिय-प्रेम विषामृत, परम चतुर दै शीश लई री॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी सखी से कहती है कि हाय! यह तो बड़ा ही बुरा हुआ। अब इस परपुरुष-रूप श्यामसुन्दर के प्रेम की बात को किस प्रकार किसी से कहूँ। देखने में तो वह नन्द का लाल छोटा ही है, किन्तु वह इतना खोटा है कि मुझ अत्यन्त चतुर को भी ठग लिया। अरी सखी! मैं चतुर होते हुए भी थोड़ी-सी मुस्कान के ऊपर अपने मन को बेचकर उस पर दीवानी हो गयी। अब हमारे लिए एक-एक पल कल्प के समान हो गया है (पलक शब्द का उल्टा कलप) एवं हृदय में विरह की विष-बेल फैल गई है। मुझे सारा संसार शून्य-सा प्रतीत होता है, एवं विरह के बादल आँखों से आँसू बरसा रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! यह विष एवं अमूत मिला हुआ प्रेम जो तुझे मिला है वह बड़े-बड़े ज्ञानियों के लिए भी दुर्लभ है। इसको पाने के लिए तो अत्यन्त ही चतुर अपना शीश प्रदान करते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 873-874

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
