विरह-माधुरी · पद 205
हमें बस, एक श्याम सों काम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hameṁ basa, eka shyāma soṁ kāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमें बस, एक श्याम सों काम।
2तुम ऊधो! कहियो माधो सों, तुम हो आत्माराम।
3हमहूँ तुमते कम नहिं नेकहुँ, जित देखूँ तित श्याम।
4हम प्रेमिनि, नहिं कामिनि मोहन, कामिनि कुब्जा बाम।
5नित्य विहार करत हम तुम सँग, कुंजनि आठों याम।
6धनि “कृपालु” गोपीजन त्रिभुवन, धन्य प्रेम निष्काम॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ श्यामसुन्दर को संदेशा भेजती हुई उद्धः से कहती हैं कि हे उद्धव! श्यामसुन्दर आवें या न आवें, हः तो एक मात्र उन्हीं से काम है। उद्धव! तुम माधो से कहना वि गोपियों ने कहा है कि हे श्यामसुन्दर! मैं मानती हूँ कि तुः आत्माराम हो किन्तु हम सब भी तुमसे जरा भी कम नहीं हैं हम जिधर भी निगाह उठाती हैं तुम ही तुम दिखाई पड़ते हो हम सब निष्काम प्रेम करने वाली हैं, अपनी कोई कामना नहं रखतीं। सकाम प्रेम करने वाली तो तुम्हारी प्राणाधिक प्यार वही कुबरी ही है। हम लोग तुम्हारे साथ सर्वदा पूर्व की भा ही निकुंजों में नित्य विहार किया करती हैं। 'कृपालु' कह हैं कि तैलोक्य में इन जगदबंद्य गोपियों को धन्य है एवं उनवे निष्काम प्रेम को भी धन्य है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 872-873