विरह-माधुरी · पद 204
हमारो सहज सनेही श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro sahaja sanehī shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो सहज सनेही श्याम।
2दृग अँसुवन सों पोय हार नित, पहिरावति उर धाम।
3ललित-त्रिभंग अनंग-विमोहन, सुमिरति आठों याम।
4रसना सों निशि-वासर छिन-छिन, गावति हरि गुन-ग्राम।
5श्रवन सुनत नित प्रियतम-चर्चा, सुधा-मधुर-मधु-नाम।
6हम “कृपालु” उनके, वे मेरे, कहा जगत सों काम॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि हमारे तो श्यामसुन्दर वभाव से ही प्रेमी हैं, अर्थात् उनसे प्रेम किये बिना मुझसे रहा हीं जाता। मैं अपने प्रियतम को निरंतर ही आँसुओं की लाएँ गूँथ-गुँथ कर अपने हृदय के ऊपर जिसमें प्रियतम का नवास है, पहनाया करती हूँ। (दोनों आँखों से आँसू बहकर धाराओं में होते हुए वक्षस्थल के बीच में जाकर मिल जाते जिससे एक माला का स्वरूप बन जाता है।) ग्रीवा, कमर वं पैर तीनों जगह से टेढ़े अनन्त-कोटि कामदेवों को मोहित ररने वाले श्यामसुन्दर का आठों पहर स्मरण किया करती हूँ बं वाणी से दिन-रात प्रतिक्षण उन्हीं के गुणों को गाया करती कृपालु' कहते हैं कि वह हमारे प्रियतम हैं और मैं उनकी यसी हूँ, संसार से मुझे क्या लेना देना है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 872