विरह-माधुरी · पद 203
हमारो, जीवन-धन-घनश्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro, jīvana-dhana ghanashyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो, जीवन-धन-घनश्याम।
2भली-बुरी जैसी हूँ पी की, कहा और सों काम।
3सुरति साँवरिहिं कबहुँ न बिसरति, पल छिन आठों याम।
4भुक्ति, मुक्ति तजि दुहुँन पिशाचिनि, गावति पिय-गुन-ग्राम।
5करम कीच अरु योग-रोग तजि, लियो प्रेम बिनु दाम।
6अस “कृपालु” रस तजि ज्ञानिन को, भयो विधाता बाम॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि हमारे तो जीवन के सर्वस्व एकमात्र श्यामसुन्दर ही हैं। मैं भली-बुरी जैसी भी हूँ, उन्हीं की हूँ। मुझे संसार से क्या स्वार्थ है। श्यामसुन्दर की रूप माधुरी का मैं दिन-रात आठों पहर निरन्तर चिन्तन करती रहती हूँ। वह छवि एक क्षण को भी नहीं भूलती। संसार के सुख एवं मोक्ष इन दोनों ही डाकिनियों को छोड़कर एकमात्र प्रियतम के गुणों को गाया करती हूँ। कर्मकांड रूपी कीचड़ एवं योग रूपी रोग का सर्वथा परित्याग करके बिना मूल्य के ही अमूल्य प्रेम प्राप्त कर लिया है। 'कृपालु' ज्ञानियों पर तरस खाते हुए कहते हैं कि ये कितने अभागे हैं, जो ऐसे मधुर रस को छोड़कर निरन्तर ही नीरस ब्रह्म-ज्ञान-रस में भटक रहे हैं। उन्हें उन ब्रह्म-ज्ञानियों के सिरमौर-भगवान् शंकर, सनकादिक, जनकादिक, शुकादिकों से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए जो अपने नीरस ब्रह्मज्ञान को छोड़कर सगुण साकार सरस-प्रेमरस के दीवाने बन गए हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 871