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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 202

सुरति नहिं, बिसरति सुंदर-श्याम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: surati nahiṁ, bisarati sundara-shyāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुरति नहिं, बिसरति सुंदर-श्याम।

2जब ते लखी श्यामसुंदर छवि, सुंदरताहुँ ललाम।

3तब ते हौं बिनु मोल बिकी सो, मोल लियो बिनु दाम।

4लखतहिं बनत चपल चितवनि छवि, मृदु-मुसकनि अभिराम।

5बसी रहत नैनन मन महँ सोइ, पल-छिन आठों याम।

6कह “कृपालु” हौं ही नहिं बावरि, बावरि सब ब्रज-बाम॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर के वियोग में एक गोपी कहती है-''अरी खि! श्यामसुन्दर की सलोनी सूरत भूलकर भी नहीं भूलती। री सखि! सुन्दरता से भी सुन्दर श्यामसुन्दर को जब से देखा तब से मैं बिना मोल के बिक गई हूँ और उन्होंने बिना मूल्य मोल ले लिया है। उनकी चंचल रस भरी चितवन की की एवं मंद-मंद मुस्कान की झाँकी बस देखते ही बनती हे। मेरे नेत्रों एवं मन में निरन्तर वह छवि बसी रहती है कृपालु' कहते हैं ''अरी सखि! मैं अकेली ही बावरी नहीं हुई हूँ समस्त ब्रजांगनाएँ मेरी ही भाँति बावरी हो चुकी हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 870-871