विरह-माधुरी · पद 201
सुनी सखि, है कोउ इक भगवान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sunī sakhi, hai kou ika bhagawāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनी सखि, है कोउ इक भगवान।
2वाही सों रोवहु अब इमि कहि, दे दो इक वरदान।
3जब सो कह"वर माँगहु, तब कह, है इक ब्रज को कान्ह।
4उनहिंन प्रीति करी पै अब उन, तजि दिय हम बनितान।
5अब उन बिन हम सब कहँ लागत, इक पल कलप समान।
6अस कछु दो वरदान भूलिहूँ, आय न कान्हहिं ध्यान।
7सखि कह"पै सखि! सुनी कान्ह सोइ, है भगवान न आन"।
8जेहि उर ध्यावन चह योगीजन, साधि समाधि महान।
9तेहि “कृपालु” चह बिसरावन सखि!, लखहु प्रेम-सखियान॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर के वियोग में एक भोली-भाली सखि कहती है-''अरी सखि! इच्छा पूरी कर देता है। कहो कि हमको एक वरदान दे दो। 'तब उनसे कहो 'ब्रज के एक श्यामसुन्दर हैं, हम लोगों उन्हीं से प्रेम किया है, किन्तु अब उन्होंने हम लोगों को होड़ दिया है'। फिर कहो कि-'हे भगवान्! बिना हम लोगों को एक क्षण भी कल्प के समान लगता है। अतएव हम लोगों को ऐसा वरदान दे दो कि भूलकर भी यामसुन्दर का ध्यान न आये।''सखी ने कहा-''अरी सखि! ने तो सुना है कि श्यामसुन्दर ही भगवान् हैं अन्य कोई गवान् नहीं हैं।''"कृपालु' कहते हैं जिस श्यामसुन्दर को माधि साधकर योगी लोग हृदय में लाने का प्रयत्न करते हैं जांगनाएँ उसी को हृदय से भुलाने का प्रयत्न कर रही हैं। पांगनाओं का प्रेम सर्वथा अनिर्वचनीय है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 869-870