# सुनी सखि, है कोउ इक भगवान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0952-M19-K201
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 201
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 440–441

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सुनी सखि, है कोउ इक भगवान।  
<a id="line-2"></a>वाही सों रोवहु अब इमि कहि, दे दो इक वरदान।  
<a id="line-3"></a>जब सो कह"वर माँगहु, तब कह, है इक ब्रज को कान्ह।  
<a id="line-4"></a>उनहिंन प्रीति करी पै अब उन, तजि दिय हम बनितान।  
<a id="line-5"></a>अब उन बिन हम सब कहँ लागत, इक पल कलप समान।  
<a id="line-6"></a>अस कछु दो वरदान भूलिहूँ, आय न कान्हहिं ध्यान।  
<a id="line-7"></a>सखि कह"पै सखि! सुनी कान्ह सोइ, है भगवान न आन"।  
<a id="line-8"></a>जेहि उर ध्यावन चह योगीजन, साधि समाधि महान।  
<a id="line-9"></a>तेहि “कृपालु” चह बिसरावन सखि!, लखहु प्रेम-सखियान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर के वियोग में एक भोली-भाली सखि कहती है-''अरी सखि! इच्छा पूरी कर देता है। कहो कि हमको एक वरदान दे दो। 'तब उनसे कहो 'ब्रज के एक श्यामसुन्दर हैं, हम लोगों उन्हीं से प्रेम किया है, किन्तु अब उन्होंने हम लोगों को होड़ दिया है'। फिर कहो कि-'हे भगवान्! बिना हम लोगों को एक क्षण भी कल्प के समान लगता है। अतएव हम लोगों को ऐसा वरदान दे दो कि भूलकर भी यामसुन्दर का ध्यान न आये।''सखी ने कहा-''अरी सखि! ने तो सुना है कि श्यामसुन्दर ही भगवान् हैं अन्य कोई गवान् नहीं हैं।''"कृपालु' कहते हैं जिस श्यामसुन्दर को माधि साधकर योगी लोग हृदय में लाने का प्रयत्न करते हैं जांगनाएँ उसी को हृदय से भुलाने का प्रयत्न कर रही हैं। पांगनाओं का प्रेम सर्वथा अनिर्वचनीय है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 869-870

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
