विरह-माधुरी · पद 200
सुनी सखि!, जा दिन ते पिय बैन।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sunī sakhi! jā dina te piya baina
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनी सखि!, जा दिन ते पिय बैन।
2ता दिन ते सखि! एकहुँ पल कहँ, परत न सपनेहुँ चैन।
3सब दिन अँसुवन-माल पिरोवति, रोवति सिगरी रैन।
4तू प्रानन-प्यारी, यह धुनि सखि!, इक पलहूँ बिसरै न।
5भूलि सकत इन नैनन पुनि कत, उन नैनन को सैन।
6बैन “कृपालु” सुनन चह श्रवनन, सैन लखन चह नैन॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-''अरी सखि! जिस दिन से श्यामसुन्दर के मधुरातिमधुर शब्दों को श्रवण किया है, उस क से एक क्षण के लिए भी किसी प्रकार भी मन को चैन नहीं है। दिन भर आँसू बहाती रहती हूँ एवं रात भर तड़पती रहती हूँ। "तू मेरी प्राण-प्यारी है'यह प्रियतम को ध्वनि एक क्षण को भी नहीं भूलती, फिर अनादि काल के प्यासे हमारे नेत्र उन श्यामसुन्दर के प्रेमरस परिप्लुत नेत्रां के कटाक्षों को कैसे भूल सकते हैं''? 'कृपालु' कहते हैं कि कान केवल श्यामसुन्दर के ही शब्द सुनना चाहते हैं एवं नेत्र श्यामसुन्दर के ही रस भरे सैन ही देखना चाहते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 868-869