विरह-माधुरी · पद 199
सुनी सखि! जा दिन ते मृदु बैन।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sunī sakhi! jā dina te mṛidu baina
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनी सखि! जा दिन ते मृदु बैन।
2ता दिन ते एकहुँ छिन कहँ सखि, परत न कैसेहुँ चैन।
3वह"प्यारी प्यारी"की धुनि सखि! दुख मेटन सुख-दैन।
4सोइ मनभावनि धुनि इन कानन, सुनन चहत दिन-रैन।
5हौं सब विधि समुझाय थकी पै, कैसेहुँ ये समुझै न।
6जब “कृपालु” अस गति बैनन सुनि, तब का गति लखि नैन॥
हिन्दी भावार्थ
विरहिणी कहती है कि अरी सखि! मैंने जब से प्रियतम श्यामसुन्दर की मधुर घाणी सुनी है तब से एक क्षण के लिए भी कहीं चैन नहीं मिलता। वह 'प्यारी-प्यारी'की धुनि परमानन्द देने वाली थी। उसी मनभावनी धुनि को सुनने के लिए मेरे कान दिन-रात हठ कर रहे हैं। मैं सब प्रकार से समझाकर थक गयी किन्तु ये कान किसी प्रकार से नहीं समझते। कृपालु' कहते हैं कि जब श्यामसुन्दर की वाणी में यह जादू है कि तू पागल हो गयी, तो जब तू उनके रूप को देखेगी तब क्या दशा होगी?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 868