विरह-माधुरी · पद 198
सुनी इन, कानन जब ते तान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sunī ina, kānana jaba te tāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनी इन, कानन जब ते तान।
2तब ते बिसरि गई सुधि सिगरी, कान करैं सखि! का न?।
3अब सो तान सुरीली मुरलिहिं, छुटत न कैसेहुँ ध्यान।
4अब सो ध्यान जरावत हमरो, सिगरो तन, मन, प्रान।
5अब सो प्रान पयान करन चह, रह्यो न कछु मोहिं भान।
6अब “कृपालु” सोइ भान रहत इक, सुनहुँ तान नहिं आन॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि अरी सखि! जब से इन कानों ने श्यामसुन्दर की सुरीली तान सुनी है तब से मुझे कोई सुधि नहीं है। ये कान जो न करें वह थोड़ा है। अरी सखि! अब तो उस मुरली की तान का ध्यान एक क्षण के लिए भी नहीं हटता एवं तान का ध्यान रहने के कारण विरह में मेरा तन, मन, प्रान सभी जल रहा है और कहाँ तक कहूँ अब मेरा प्राण निकलना चाहता है। मुझे कुछ भी होश नहीं है। 'कृपालु के शब्दों में मुझे एक ही होश है कि वह तान फिर कब सुनूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 867