विरह-माधुरी · पद 197
सहि जाय विरह नहिं हाय रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sahi jāya viraha nahiṁ hāya re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सहि जाय विरह नहिं हाय रे।
2गगन सघन घन घेरि घेरि जनु, तनु घनश्याम बताय रे।
3दामिनि दमकि दमकि जनु घन महँ, पीतांबर दरसाय रे।
4कोकिल कूकि कूकि मधु-बैनन, जनु पिय बैन सुनाय रे।
5पपिहा पीवु, पीवु कहि जनु सखि!, कहत आय पिय, आय रे।
6हाय डरति सखि! कहुँ “कृपालु” अब, प्रान निकसि नहिं जाय रे॥
हिन्दी भावार्थ
ः एक विरहिणी कहती है अरी .सखि! अब तो श्यामसुन्दर का वियोग सहा नहीं जाता। देख तो सखि! आकाश में घनघोर घटायें घिर कर मानो श्यामसुन्दर को ही दिखा रही हैं। बादलों में बिजली चमक-चमक कर मानो पीताम्बर दिखा रही है। कोकिल मधुर स्वर में कूक-कूक कर मानो श्यामसुन्दर की मधुर ध्वनि सुना रही है। पपीहा "पीउ-पीउ'कह कर मानो यह कह रहा है कि श्यामसुन्दर आ गये, श्यामसुन्दर आ गये। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि मुझे सबसे बड़ा भय यही है कि कहीं मेरे प्राण न निकल जायँ। अगर ऐसा हो गया तो प्रियतम कलंकित हो जायेंगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 866-867