विरह-माधुरी · पद 196
सवतिया निंदिया मोहिं सताये।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: savatiyā niṁdiyā mohiṁ satāye
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सवतिया निंदिया मोहिं सताये।
2जब ते लखी सपनवाँ मनवाँ, नेकु चैन न आये।
3सोवन चहति यतन करि, पुनि पुनि, विरहा आय जगाये।
4बिनु निंदिया नहिं होय सपनवाँ, तेहि बिनु कित पिय पाये।
5बौरानी-सी फिरति चहूँ दिशि, पिया-मिलन मनभाये।
6कस “कृपालु” कोउ दोष देउ जब, निज मन भये पराये॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि नींद सौत बनकर मुझे दुःख दे रही है। जब से मैंने स्वप्न में प्यारे श्यामसुन्दर को देखा है, तब से मेरे मन को एक क्षण के लिए चैन नहीं मिलता। मैं निद्रा के लिए विविध प्रकार के प्रयत्न करती हूँ किन्तु विरह आकर मुझे जगा देता है। बिना निद्रा के स्वप्न कैसे दिखाई पड़े एवं बिना स्वप्न के प्रियतम से मधुर मिलन कैसे हो। प्रियतम के मधुर-मिलन के लिए पागल-सी चारों ओर घूमा करती हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी विरहिणी! तू किसी को क्यों दोष देती है?? जब कि तेरा मन ही तेरे हाथ में नहीं है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 866