# सवतिया निंदिया मोहिं सताये।

स्थायी पृष्ठ: https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0947-m19-k196/
भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0947-M19-K196
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 196
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 438–439

[English](https://radhey.shreyam1008.com.np/en/prem-ras-madira/pad/prm-0947-m19-k196/) · [पुस्तक की अनुक्रमणिका](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/) · [दोनों भाषाओं में पुस्तक पढ़ें](https://radhey.shreyam1008.com.np/PRM/?pad=947&mode=reader&lang=both) · [दोनों भाषाओं का स्रोत पाठ](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/prm/prm-0947-m19-k196.md)

## मूल पद

<a id="line-1"></a>सवतिया निंदिया मोहिं सताये।  
<a id="line-2"></a>जब ते लखी सपनवाँ मनवाँ, नेकु चैन न आये।  
<a id="line-3"></a>सोवन चहति यतन करि, पुनि पुनि, विरहा आय जगाये।  
<a id="line-4"></a>बिनु निंदिया नहिं होय सपनवाँ, तेहि बिनु कित पिय पाये।  
<a id="line-5"></a>बौरानी-सी फिरति चहूँ दिशि, पिया-मिलन मनभाये।  
<a id="line-6"></a>कस “कृपालु” कोउ दोष देउ जब, निज मन भये पराये॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि नींद सौत बनकर मुझे दुःख दे रही है। जब से मैंने स्वप्न में प्यारे श्यामसुन्दर को देखा है, तब से मेरे मन को एक क्षण के लिए चैन नहीं मिलता। मैं निद्रा के लिए विविध प्रकार के प्रयत्न करती हूँ किन्तु विरह आकर मुझे जगा देता है। बिना निद्रा के स्वप्न कैसे दिखाई पड़े एवं बिना स्वप्न के प्रियतम से मधुर मिलन कैसे हो। प्रियतम के मधुर-मिलन के लिए पागल-सी चारों ओर घूमा करती हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी विरहिणी! तू किसी को क्यों दोष देती है?? जब कि तेरा मन ही तेरे हाथ में नहीं है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 866

[पिछला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0946-m19-k195/) · [अगला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0948-m19-k197/)

## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
- [लेखक का आधिकारिक परिचय](https://jagadgurukripalujimaharaj.org.in/)
- [प्रेम रस मदिरा: आधिकारिक पुस्तक विवरण](https://www.jkpliterature.org.in/products/prem-ras-madira-regular-size)
- [संस्करण और स्रोत प्रमाण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/provenance.json)
- [पुस्तकालय के आवरणों का स्रोत विवरण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/books/index.json)
- [स्रोत और पाठ-सुधार](https://radhey.shreyam1008.com.np/collection/)

मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
