विरह-माधुरी · पद 195
सताये, शशि सिगरी निशि हाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: satāye, shashi sigarī nishi hāya!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सताये, शशि सिगरी निशि हाय।
2रत्नाकर-कुल-कानि आनि तजि, शिव-सिर थितिहिं लजाय।
3विरहिनि-वध-कुकलंक अंक धरि, निशि मयंक मुसकाय।
4करत कुमुदिनी तप जल बिच जो, तेहि शठ दूरि बसाय।
5कोटि-हलाहल गरल उग्रतर, शशि विष मोहिं जनाय।
6ताही सों “कृपालु” डरि शंकर, शशि निज शीश चढ़ाय॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी चन्द्रमा को कोसती हुई कहती है कि हाय! हाय!! यह चन्द्रमा तो मुझे सारी रात दुःख देने पर तुला हुआ है और मुझे जला रहा है। संसार में दुष्टता या तो कुल परम्परा से होती है या संग से होती है किन्तु इस चन्द्रमा का तो कुल भी रत्नाकर अर्थात् समुद्र है और इसका संग भी भगवान शंकर का ललाट है, फिर ऐसा जलाने का कुत्सित कार्य क्यो करता है? यह चन्द्रमा ऐसा निर्लज्ज है कि विरहिणियों की हत्या कलंक कालिमा-रूप से अपने हृदय में रखकर रात में समस्त संसार के समक्ष मुस्कराता है एवं उसकी प्रेमिका कुमुदिनी जो उसके लिए निरंतर जल में निमग्न होकर तपस्या करती है उसको उस दुष्ट ने अपने से बहुत दूर कर रखा है। मेरी समझ से तो चन्द्रमा के विष का ताप शंकरजी के द्वारा पिये हुए हलाहल से भी अत्यन्त तेज है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 865