विरह-माधुरी · पद 194
सखी! हम, इन पाँचन ते हारे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! hama, ina pāṁchana te hāre
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! हम, इन पाँचन ते हारे।
2लोचन लखन कमल-लोचन चह, निशि दिन बहत पनारे।
3रसना श्याम-नाम-रस-चाखन, हित नित पियहिं पुकारे।
4दिव्य सुगन्ध हेतु जनु नासा, दीरघ श्वास निकारे।
5सुधा-मधुर-मधु पिय मुख वानी, सुनन श्रवन हठ धारे।
6रोम रोम चह परस पिया को, स्वेद कंप विस्तारे।
7अब “कृपालु” की कौन सुने जब, पंच एक मत वारे॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी अपनी सखी से कहती है कि अरी सखी! मैं तो इन पाँचों जञनेन्द्रियों से हार चुकी। नेत्र कमलनयन श्यामसुन्दर को देखने के लिए दिन-रात आँसुओं के पनारे बहाया करते हैं। रसना निरंतर ही श्याम नाम का वास्तविक दिव्य रसास्वादन करने के लिए प्रियतम को ही पुकारा करती है। नाक प्रियतम की चिन्मय देह की दिव्य सुगन्ध के लिए ही मानो लम्बी-लम्बी साँसें निकालती रहती है और कान अमृत से भी अत्यन्त मधुर प्रियतम के मुख की वाणी सुनने के हेतु हठपूर्वक अड़े हुए हैं। मेरे शरीर का रोम-रोम प्रियतम के स्पर्श हेतु स्वेद बहाता तथा कम्पन पैदा करता है। 'कृपालु' कहते हैं अब मेरी भला कौन सुनेगा, जब ये पाँच ज्ञानेन्द्रिय रूपी पंच एकमत वाले हैं। कलियुग में तो बहुमत ही माना जाता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 864-865