विरह-माधुरी · पद 193
सखी! सुनु, समय होत बलवान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! sunu, samaya hota balawāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! सुनु, समय होत बलवान।
2एक दिना हरि हमहिं मनावत, हौं बैठति करि मान।
3आजु मनावत प्राण जात पै, कान्ह करत नहिं कान।
4एक दिना हरि मोहिं बिन पल छिन, रहि न सकत थल आन।
5आजु विकल हम पल पल तलफति, तजत न कुब्जा-ध्यान।
6एक दिना हरि हते खिलौना, सुनति छाछ दै तान।
7आजु “कृपालु” भये हरि दूभर, गूलर फूल समान॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी गोपी अपनी सखी से कहती है कि अरी सखी! समय बड़ा बलवान होता है। एक दिन वह था कि जब प्रियतम श्यामसुन्दर हमें मनाया करते थे एवं हम बार बार मान किया करती थीं, किन्तु आज मनाते-मनाते प्राण निकले जा रहे हैं, फिर भी श्यामसुन्दर हमारी पुकार नहीं सुनते। हे सखी! एक दिन वह था जब श्यामसुन्दर हमारे बिना एक क्षण भी दूसरी जगह नहीं रह सकते थे। किन्तु आज हम अत्यन्त व्याकुल होकर पल-पल तड़प रही हैं, फिर भी श्यामसुन्दर का कुब्जा में लगा हुआ मन नहीं छूट रहा है। अरी सखी! एक दिन वह था जब श्यामसुन्दर हमारे खिलौना बने हुए थे एवं हम जरा सी छाछ देकर मुरली की तान सुना करती थीं। किन्तु 'कृपालु' कहते हैं कि आज वे ही श्यामसुन्दर हमारे लिए गूलर के फूल के समान दुर्लभ हो गये हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 863-864