# सखी! सुनु, समय होत बलवान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0944-M19-K193
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 193
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 437–437

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! सुनु, समय होत बलवान।  
<a id="line-2"></a>एक दिना हरि हमहिं मनावत, हौं बैठति करि मान।  
<a id="line-3"></a>आजु मनावत प्राण जात पै, कान्ह करत नहिं कान।  
<a id="line-4"></a>एक दिना हरि मोहिं बिन पल छिन, रहि न सकत थल आन।  
<a id="line-5"></a>आजु विकल हम पल पल तलफति, तजत न कुब्जा-ध्यान।  
<a id="line-6"></a>एक दिना हरि हते खिलौना, सुनति छाछ दै तान।  
<a id="line-7"></a>आजु “कृपालु” भये हरि दूभर, गूलर फूल समान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी गोपी अपनी सखी से कहती है कि अरी सखी! समय बड़ा बलवान होता है। एक दिन वह था कि जब प्रियतम श्यामसुन्दर हमें मनाया करते थे एवं हम बार बार मान किया करती थीं, किन्तु आज मनाते-मनाते प्राण निकले जा रहे हैं, फिर भी श्यामसुन्दर हमारी पुकार नहीं सुनते। हे सखी! एक दिन वह था जब श्यामसुन्दर हमारे बिना एक क्षण भी दूसरी जगह नहीं रह सकते थे। किन्तु आज हम अत्यन्त व्याकुल होकर पल-पल तड़प रही हैं, फिर भी श्यामसुन्दर का कुब्जा में लगा हुआ मन नहीं छूट रहा है। अरी सखी! एक दिन वह था जब श्यामसुन्दर हमारे खिलौना बने हुए थे एवं हम जरा सी छाछ देकर मुरली की तान सुना करती थीं। किन्तु 'कृपालु' कहते हैं कि आज वे ही श्यामसुन्दर हमारे लिए गूलर के फूल के समान दुर्लभ हो गये हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 863-864

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
