विरह-माधुरी · पद 192
सखी! सुनु, अस मम उर परतीति।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! sunu, asa mama ura paratīti
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! सुनु, अस मम उर परतीति।
2अइहैं अवशि श्यामसुंदर पुनि, जानि प्रीति की रीति।
3कैसे बिसरैहैं मनमोहन, इन ब्रजवासिन-प्रीति।
4जिन सँग विहरत रात पलक महँ, जाति रही सखि बीति।
5तिन बिसराय हाय! सखि! कैसे, करिहैं अस अनरीति।
6कह “कृपालु” कोउ निठुर कहै जनि, इहै एक रह भीति॥
हिन्दी भावार्थ
(मथुरा गमन के पश्चात् गोपियों की परस्परोक्ति) एक सखी कहती है-'अरी सखी! मुझे तो ऐसा विश्वास होता है कि प्रेम के आचार्य श्यामसुन्दर अवश्य आयेंगे। ब्रजवासियों की अहैतुकी-प्रीति को भला वे किस प्रकार भुला सकेंगे? जिन ब्रजांगनाओं के साथ विहार करते हुए सम्पूर्ण रात्रि पलक के समान बीत जाती थी, उन्हें भुलाकर भला ऐसी अनरीति वे कैसे कर सकेंगे?'कृपालु' कहते हैं-''वैसे उनको जो इच्छा हो करें, किन्तु मुझे डर यह है कि उनके न आने से उन्हें कोई निष्ठुर न मान ले''।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 862-863