विरह-माधुरी · पद 191
सखी! शशि, किरन अगिनि तनु लायो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! shashi, kirana agini tanu lāyo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! शशि, किरन अगिनि तनु लायो।
2नाम सुधाकर, काम दिवाकर, किन गुरु तोहिं सिखायो?।
3उदधि-निहित बड़वानल सों या, हालाहल सों पायो।
4गिरि मंदर गिरि चूर चूर तोहिं, कियो नाहिं बचि आयो।
5पियत पयोनिधि ऋषि अगस्त्य कस, तोहिं न उदर पचायो।
6किमि “कृपालु” बड़वानल सम शशि, उदधि न उदर दुरायो॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी चन्द्रमा की किरणों से व्याकुल होकर अपनी अन्तरंग सखी से कहती हैं कि अरी सखी! इन चन्द्रमा की किरणों ने तो मेरे सारे शरीर में आग लगा दी है। अरे दुष्ट चन्द्रमा! तेरा नाम तो सुधाकर अर्थात् अमृत की किरणों को बरसाने वाला है पर तेरा काम दिवाकर अर्थात् आग बरसाने जाला है, यह निकृष्ट कार्य तुझे किस निकृष्ट गुरु ने सिखाया है। समुद्र में स्थित बड़वानल (पानी की आग) से अथवा हलाहल (समुद्र से निकला हुआ विष) से यह जलाने का काम सीखा है। अरे दुष्ट! जब इन्द्र के वज्र के भय से मंदराचल पर्वत समुद्र में गिरा था, तब तू उससे दब कर चूर-चूर होने से क्यों बच गया? अर्थात् अच्छा होता कि तू तभी नष्ट हो गया होता, अथवा जब आगस्त्य मुनि ने समुद्र का पान किया था, तब तू भी उनके पेट में क्यों नहीं पच गया। 'कृपालु' कहते हैं कि सबसे बड़ी भूल समुद्र की है जो उसने बड्वानल की तरह चन्द्रमा को भी अपने भीतर ही नहीं रखा, वरन् समुद्र-मंथन में चन्द्रमा को प्रकर कर दिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 861-862