# सखी! शशि, किरन अगिनि तनु लायो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0942-M19-K191
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 191
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 436–436

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! शशि, किरन अगिनि तनु लायो।  
<a id="line-2"></a>नाम सुधाकर, काम दिवाकर, किन गुरु तोहिं सिखायो?।  
<a id="line-3"></a>उदधि-निहित बड़वानल सों या, हालाहल सों पायो।  
<a id="line-4"></a>गिरि मंदर गिरि चूर चूर तोहिं, कियो नाहिं बचि आयो।  
<a id="line-5"></a>पियत पयोनिधि ऋषि अगस्त्य कस, तोहिं न उदर पचायो।  
<a id="line-6"></a>किमि “कृपालु” बड़वानल सम शशि, उदधि न उदर दुरायो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी चन्द्रमा की किरणों से व्याकुल होकर अपनी अन्तरंग सखी से कहती हैं कि अरी सखी! इन चन्द्रमा की किरणों ने तो मेरे सारे शरीर में आग लगा दी है। अरे दुष्ट चन्द्रमा! तेरा नाम तो सुधाकर अर्थात् अमृत की किरणों को बरसाने वाला है पर तेरा काम दिवाकर अर्थात् आग बरसाने जाला है, यह निकृष्ट कार्य तुझे किस निकृष्ट गुरु ने सिखाया है। समुद्र में स्थित बड़वानल (पानी की आग) से अथवा हलाहल (समुद्र से निकला हुआ विष) से यह जलाने का काम सीखा है। अरे दुष्ट! जब इन्द्र के वज्र के भय से मंदराचल पर्वत समुद्र में गिरा था, तब तू उससे दब कर चूर-चूर होने से क्यों बच गया? अर्थात् अच्छा होता कि तू तभी नष्ट हो गया होता, अथवा जब आगस्त्य मुनि ने समुद्र का पान किया था, तब तू भी उनके पेट में क्यों नहीं पच गया। 'कृपालु' कहते हैं कि सबसे बड़ी भूल समुद्र की है जो उसने बड्वानल की तरह चन्द्रमा को भी अपने भीतर ही नहीं रखा, वरन् समुद्र-मंथन में चन्द्रमा को प्रकर कर दिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 861-862

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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