विरह-माधुरी · पद 190
सखी! ये, दृग न दृगन सुख पाये।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ye, dṛiga na dṛigana sukha pāye
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! ये, दृग न दृगन सुख पाये।
2निरखत ही छवि नव नीरद तनु, आनँद जल भरि आये।
3पुनि बिछुरत ही श्याम सुरति करि, दृग अँसुवन झरि लाये।
4दुहूँ भाँति तिय लखि न सकति पिय, बिनु देखे घबराये।
5विधि बुधि गइ सठियाय हाय! जो अँखियन पलक बनाये।
6करि “कृपालु” पिय दृग पट, पलकनि, क्यों न कपाट लगाये॥
हिन्दी भावार्थ
(एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है।) अरी सखी! इन आँखों को देखने का सुख कभी न मिला। क्योंकि यह जब ही नवीन बादलों की कान्ति के समान चिन्मय देह वाले श्यामसुन्दर को देखती हैं, तभी इन आँखों में आनन्द के आँसू भर आते हैं जिससे श्यामसुन्दर को नहीं देख पातीं एवं श्यामसुन्दर के वियोग में उनका स्मरण करके आँखों में जल भरा रहता है अतएव इन आँखों को प्रियतम के दर्शन का सुख कभी नहीं मिल पाता। इसके अतिरिक्त ब्रह्मा की बुद्धि भी भ्रष्ट-सी हो गयी जिसने आँखों में पलक बनाकर प्रियतम के मिलने में और भी एक व्यवधान-सा पैदा कर दिया है। कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! तू इस झगड़े में क्यों पड़ती है? तू अपने प्रियतम को आँखों के कमरे में बन्द करके पलकों के किवाड़ लगाकर नित्य ही मधुर-मिलन का अनुभव ह कर।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 860-861