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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 189

सखी! ये, कारे सब ठगहार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ye, kāre saba ṭhagahāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी! ये, कारे सब ठगहार।

2इत चातक अनन्य-रति, घन उत, चपला संग विहार।

3पिक निज सुत कागा घर राख्यो, कपट-भेद उर धार।

4भ्रमर भ्रमत रस लेत रैन-दिन, विकसित कुसुम अपार।

5हम गोपिन को कियो वियोगिनि, दियो कूबरिहिं प्यार।

6अब “कृपालु” पुनि पछिताने का?, जब बाजी गइ हार॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी प्यारे श्यामसुन्दर के वियोग में खीझकर कहती है कि अरी सखी! जितने लोग काले रंग के हैं वे सभी ठगने वाले होते हैं। अरी.सखी! देख, स्वाती के बादलों का अनन्य-प्रेमी पपीहा तो इधर दिन-रात पी-पी की रटना लगाये रहता है, किन्तु फिर भी वह काला बादल उसकी उपेक्षा करता हुआ बिजली के साथ विहार करता है। कोयल को देख! वह भी काली है, अतएव हृदय में महान् कपट रखकर अपने बच्चे को कौए के पास पालने-पोसने के लिए रख आती है। भौरे को देख! वह भी काला है अतएव स्वार्थमयी भावना से अनंतानंत फूलों का रस लेता हुआ पिछले रस लिये हुए फूलों को सदा ही छोड़ता जाता है अर्थात् वह किसी भी फूल से प्रेम नहीं करता। ठीक इसी प्रकार यह काला (श्यामसुन्दर) हम गोपियों को वियोग देकर मथुरा में कुब्जा से प्रेम कर रहा है। "कृपालु कहते हैं कि अब पछताने से क्या होता है, जबकि दाँव पहले ही हार चुकी। अर्थात् अब तो उसी काले से तेरा स्वार्थ सिद्ध होगा उसकी निन्दा क्यों कर रही है?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 859-860