विरह-माधुरी · पद 188
सखी! ये, कानन बहुत बुरे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ye, kānana bahuta bure
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! ये, कानन बहुत बुरे।
2जब ते सुनी तान नँदनंदन, उनहिंन ओर ढुरे।
3हौं समुझावत हारि गई पै, नहिं मानत निगुरे।
4मुरलिहिं तान सुनाय श्याम तो, कुंजनि माहिं दुरे।
5इत हौं ठाढ़ी रही मूँदि दृग, कानन मुख न मुरे।
6क्यों “कृपालु” कछु दोष देति, इन कारन नात जुरे॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! ये मेरे दोनों सुरीली तान सुनी है तब से उन्हीं की ओर जा मिले हैं। मैं समझाकर हार गयी किन्तु ये निगोड़े नहीं मानते हैं। श्यामसुन्दर तो मुरली की तान सुनाकर लताओं में छिप गये किन्तु मैं वहीं पर आँख बन्द किये खड़ी रह गयी। इन कानों ने मुझे आने ही नहीं दिया। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! इन कानों को क्यों दोष देती है। इन्हीं के कारण तो श्यामसुन्दर से प्रेम हुआ है। ये कान निंदनीय नहीं हैं अपितु वन्दनीय हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 859