लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 187

सखी! ये, अँखियाँ गई पथराय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ye, aṁkhiyāṁ gaīṁ patharāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी! ये, अँखियाँ गई पथराय।

2पल-पल परखत हारि गई हौं, तबहुँ न प्रियतम आय।

3निशिदिन नैनन नीर बहावत, दृग जल गयेउ सुखाय।

4जग-सुख छीनि लई उन ता दिन, जा दिन नैन मिलाय।

5अब तो आपुन सुधिहुँ भूलि गइ, कहा करूँ सखि, हाय!।

6जनि “कृपालु” बहकाउ रोम प्रति, प्रियतम रहेउ समाय॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि अरी सखि! प्रतिक्षण प्रियतम की बाट जोहते-जोहते मेरी आँखें पथरा गयीं किन्तु फिर भी प्रियतम नहीं आये। श्यामसुन्दर के वियोग में दिन रात आँसू बहाते-नहाते अब तो आँसू भी सूख गये हैं। अरी सखि! संसार का सुख तो उन्होंने उसी दिन छीन लिया जिस दिन आँखें चार हुई थीं। अब तो मुझे अपनी भी सुधि नहीं है। हाय सखि! अब मैं क्या कंरू! 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! तेरे तो रोम-रोम में प्रियतम समाया हुआ है फिर तू मुझे क्यों पट्टी पढ़ा रही है?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 858